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Rigveda Mandal 5 / Sukta 74 / Mantra 6

87 Sukta
10 Mantra
5/74/6
Devata- अश्विनौ Rishi- पौर आत्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अस्ति॒ हि वा॑मि॒ह स्तो॒ता स्मसि॑ वां सं॒दृशि॑ श्रि॒ये। नू श्रु॒तं म॒ आ ग॑त॒मवो॑भिर्वाजिनीवसू ॥६॥

अस्ति॑ । हि । वा॒म् । इ॒ह । स्तो॒ता । स्मसि॑ । वा॒म् । स॒म्ऽदृशि॑ । श्रि॒ये । नु । श्रु॒तम् । मे॒ । आ । ग॒त॒म् । अवः॑ऽभिः । वा॒जि॒नी॒व॒सू॒ इति॑ वाजिनीऽवसू ॥

Mantra without Swara
अस्ति हि वामिह स्तोता स्मसि वां संदृशि श्रिये। नू श्रुतं म आ गतमवोभिर्वाजिनीवसू ॥

अस्ति। हि। वाम्। इह। स्तोता। स्मसि। वाम्। सम्ऽदृशि। श्रिये। नु। श्रुतम्। मे। आ। गतम्। अवःऽभिः। वाजिनीवसू इति वाजिनीऽवसू ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वाजिनीवसु) बहुत अन्नादि क्रिया को वसानेवाले अध्यापक और उपदेशक जनो ! (इह) इस संसार में जो (वाम्) आप दोनों का (स्तोता) प्रशंसा करनेवाला (अस्ति) है उसको (हि) जिससे हम लोग प्राप्त (स्मसि) होवें और (वाम्) आप दोनों को (संदृशि) सादृश्य में (श्रिये) धन के लिये (नु) शीघ्र (श्रुतम्) सुनिये और (अवोभिः) रक्षणादिकों से मुझ को प्राप्त हूजिये (मे) मेरे कथन को सुनने को (आ, गतम्) आइये ॥६॥
Essence
जो विद्वानों के गुणों की स्तुति करते हैं, वे गुणों से युक्त हो और विद्वानों की समता को प्राप्त होकर श्रीमान् होते हैं ॥६॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥