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Rigveda Mandal 5 / Sukta 74 / Mantra 10

87 Sukta
10 Mantra
5/74/10
Devata- अश्विनौ Rishi- पौर आत्रेयः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अश्वि॑ना॒ यद्ध॒ कर्हि॑ चिच्छुश्रू॒यात॑मि॒मं हव॑म्। वस्वी॑रू॒ षु वां॒ भुजः॑ पृ॒ञ्चन्ति॒ सु वां॒ पृचः॑ ॥१०॥

अश्वि॑ना । यत् । ह॒ । कर्हि॑ । चि॒त् । शु॒श्रु॒यात॑म् । इ॒मम् । हव॑म् । वस्वीः॑ । ऊँ॒ इति॑ । सु । वा॒म् । भुजः॑ । पृ॒ञ्चन्ति॑ । सु । वा॒म् । पृचः॑ ॥

Mantra without Swara
अश्विना यद्ध कर्हि चिच्छुश्रूयातमिमं हवम्। वस्वीरू षु वां भुजः पृञ्चन्ति सु वां पृचः ॥

अश्विना। यत्। ह। कर्हि। चित्। शुश्रूयातम्। इमम्। हवम्। वस्वीः। ऊँ इति। सु। वाम्। भुजः। पृञ्चन्ति। सु। वाम्। पृचः ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 14 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो ! (यत्) जो (कर्हि, चित्) कभी हम लोगों को (इमम्) इस वर्त्तमान (हवम्) प्रशंसा को (शुश्रूयातम्) प्राप्त होओ और जो (पृचः) कामना और (वस्वीः) धनसम्बन्धिनी (भुजः) भोग की क्रियाओं को (वाम्) आप दोनों के सम्बन्ध में (सु) उत्तम प्रकार (पृञ्चन्ति) सम्बन्धित करते हैं उनको (ह) निश्चय से (उ) और (वाम्) आप दोनों की हम लोग (सु) उत्तम प्रकार कामना करें ॥१०॥
Essence
जो विद्वान् जन विद्यार्थियों की परीक्षा करते हैं, उनको विद्यार्थीजन विद्वान् होकर प्रसन्न करते हैं ॥१०॥ इस सूक्त में अध्यापक, उपदेशक और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चौहत्तरवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥