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Rigveda Mandal 5 / Sukta 74 / Mantra 1

87 Sukta
10 Mantra
5/74/1
Devata- अश्विनौ Rishi- पौर आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
कूष्ठो॑ देवावश्विना॒द्या दि॒वो म॑नावसू। तच्छ्र॑वथो वृषण्वसू॒ अत्रि॑र्वा॒मा वि॑वासति ॥१॥

कूऽस्थः॑ । दे॒वौ॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । अ॒द्य । दि॒वः । म॒ना॒व॒सू॒ इति॑ । तत् । श्र॒व॒थः॒ । वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृषण्ऽवसू । अत्रिः॑ । वा॒म् । आ । वि॒वा॒स॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
कूष्ठो देवावश्विनाद्या दिवो मनावसू। तच्छ्रवथो वृषण्वसू अत्रिर्वामा विवासति ॥

कूऽस्थः। देवौ। अश्विना। अद्य। दिवः। मनावसू इति। तत्। श्रवथः। वृषण्ऽवसू इति वृषण्ऽवसू। अत्रिः। वाम्। आ। विवासति ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 1

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Meaning
हे (मनावसू) मन को वसानेवाले (वृषण्वसू) उत्तमों को वसानेवाले (अश्विना) विद्या से व्याप्त (देवौ) विद्वानो ! जो (कूष्ठः) पृथिवी में स्थित होनेवाला (अत्रिः) विद्या प्राप्त जन (अद्य) इस समय (दिवः) प्रकाश के सम्बन्ध में (वाम्) आप दोनों का (आ, विवासति) सब प्रकार से सेवन करता है (तत्) उसको आप दोनों (श्रवथः) सुनते हैं ॥१॥
Essence
हे विद्वानो ! जो आप लोगों का सेवन करते हैं वे बहुश्रुत, विचारशील विद्वान् जन सम्पूर्ण श्रेष्ठ कर्म्मों का सेवन करते हैं और वे दुःख से रहित होते हैं ॥१॥
Subject
अब दश ऋचावाले चौहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में अब मनुष्यों को क्या अनुष्ठान करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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