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Rigveda Mandal 5 / Sukta 73 / Mantra 6

87 Sukta
10 Mantra
5/73/6
Devata- अश्विनौ Rishi- पौर आत्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यु॒वोरत्रि॑श्चिकेतति॒ नरा॑ सु॒म्नेन॒ चेत॑सा। घ॒र्मं यद्वा॑मरे॒पसं॒ नास॑त्या॒स्ना भु॑र॒ण्यति॑ ॥६॥

यु॒वोः । अत्रिः॑ । चि॒के॒त॒ति॒ । नरा॑ । सु॒म्नेन॑ । चेत॑सा । घ॒र्मम् । यत् । वा॒म् । अ॒रे॒पस॑म् । नास॑त्या । आ॒स्ना । भु॒र॒ण्यति॑ ॥

Mantra without Swara
युवोरत्रिश्चिकेतति नरा सुम्नेन चेतसा। घर्मं यद्वामरेपसं नासत्यास्ना भुरण्यति ॥

युवोः। अत्रिः। चिकेतति। नरा। सुम्नेन। चेतसा। घर्मम्। यत्। वाम्। अरेपसम्। नासत्या। आस्ना। भुरण्यति ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 12 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नासत्या) असत्य से रहित (नरा) धर्म्म मार्ग में चलनेवाले दो नायक जनो ! (यत्) जो (अत्रिः) आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक आदि तीन प्रकार के दुःख से रहित जन (सुम्नेन) सुख और (चेतसा) चित्त से (युवोः) आप दोनों अध्यापक और उपदेशकों के (घर्मम्) यज्ञ को (चिकेतति) जानता और (आस्ना) मुख से (वाम्) आप दोनों के (अरेपसम्) अपराधरहित यज्ञ को (भुरण्यति) धारण करता है, उसको आप जानिये ॥६॥
Essence
जो पुरुष विद्वानों के सङ्ग से अध्ययन और अध्यापन रूप यज्ञ का विस्तार करते हैं, वे संसार के उपकारक हैं ॥६॥
Subject
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥