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Rigveda Mandal 5 / Sukta 73 / Mantra 5

87 Sukta
10 Mantra
5/73/5
Devata- अश्विनौ Rishi- पौर आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ यद्वां॑ सू॒र्या रथं॒ तिष्ठ॑द्रघु॒ष्यदं॒ सदा॑। परि॑ वामरु॒षा वयो॑ घृ॒णा व॑रन्त आ॒तपः॑ ॥५॥

आ । यत् । वा॒म् । सू॒र्या । रथ॑म् । तिष्ठ॑त् । र॒घु॒ऽस्यद॑म् । सदा॑ । परि॑ । वा॒म् । अ॒रु॒षाः । वयः॑ । घृ॒णा । व॒र॒न्ते॒ । आ॒तपः॑ ॥

Mantra without Swara
आ यद्वां सूर्या रथं तिष्ठद्रघुष्यदं सदा। परि वामरुषा वयो घृणा वरन्त आतपः ॥

आ। यत्। वाम्। सूर्या। रथम्। तिष्ठत्। रघुऽस्यदम्। सदा। परि। वाम्। अरुषाः। वयः। घृणा। वरन्ते। आऽतपः ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 11 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (घृणा) प्रकाशित (अरुषाः) लाल चमकते हुए गुणोंवाली (सूर्या) सूर्य्यसम्बन्धिनी प्रातर्वेला के सदृश स्त्री (वाम्) तुम्हारे (रघुष्यदम्) थोड़े चलनेवाले (रथम्) विमान आदि वाहन पर (आ) सब प्रकार से (तिष्ठत्) स्थित होती है, जिसको (वाम्) आप दोनों के (वयः) पक्षी (परि, वरन्ते) सब ओर से स्वीकार करते हैं, वह (आतपः) चारों और से उष्ण करनेवाले घर्म्म के सदृश (सदा) सब काल में उपकार करनेवाली होती है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे प्रातःकाल सब प्रकार से प्रिय और सुखकारक है, वैसे परस्पर प्रीतियुक्त स्त्री पुरुष प्रसन्न रहते हैं ॥५॥
Subject
फिर स्त्रियाँ कैसी हों, इस विषय को कहते हैं ॥