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Rigveda Mandal 5 / Sukta 73 / Mantra 4

87 Sukta
10 Mantra
5/73/4
Devata- अश्विनौ Rishi- पौर आत्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तदू॒ षु वा॑मे॒ना कृ॒तं विश्वा॒ यद्वा॒मनु॒ ष्टवे॑। नाना॑ जा॒ताव॑रे॒पसा॒ सम॒स्मे बन्धु॒मेय॑थुः ॥४॥

तत् । ऊँ॒ इति॑ । सु । वा॒म् । ए॒ना । कृ॒तम् । विश्वा॑ । यत् । वा॒म् । अनु॑ । स्तवे॑ । नाना॑ । जा॒तौ । अ॒रे॒पसा॑ । सम् । अ॒स्मे इति॑ । बन्धु॑म् । आ । ई॒य॒थुः॒ ॥

Mantra without Swara
तदू षु वामेना कृतं विश्वा यद्वामनु ष्टवे। नाना जातावरेपसा समस्मे बन्धुमेयथुः ॥

तत्। ऊँ इति। सु। वाम्। एना। कृतम्। विश्वा। यत्। वाम्। अनु। स्तवे। नाना। जातौ। अरेपसा। सम्। अस्मे इति। बन्धुम्। आ। ईयथुः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 11 Mantra » 4

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Meaning
हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! (यत्) जो आप दोनों ने (कृतम्) सिद्ध किया (तत्) उन (एना) इन (विश्वा) संपूर्णों की मैं (अनु, स्तवे) स्तुति करता हूँ और जो (अरेपसा) अपराधरहित (नाना) अनेक प्रकार (जातौ) प्रकट (वाम्) आप दोनों प्राप्त होते हैं वह =आप दोनों (अस्मे) हम लोगों के (बन्धुम्) बन्धु को (सम्, आ, ईयथुः) प्राप्त हूजिये (उ) और उसको मैं (वाम्) आप दोनों की (सु) उत्तम प्रकार प्रेरणा करूँ ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे मैं वायु और बिजुली की विद्या को जानूँ, वैसे ही आप लोग भी जानिये ॥४॥
Subject
फिर मनुष्य क्या विशेष जानें, इस विषय को कहते हैं ॥

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