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Rigveda Mandal 5 / Sukta 73 / Mantra 1

87 Sukta
10 Mantra
5/73/1
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- बाहुवृक्त आत्रेयः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यद॒द्य स्थः प॑रा॒वति॒ यद॑र्वा॒वत्य॑श्विना। यद्वा॑ पु॒रू पु॑रुभुजा॒ यद॒न्तरि॑क्ष॒ आ ग॑तम् ॥१॥

यत् । अ॒द्य । स्थः॒ । पा॒रा॒ऽवति॑ । यत् । आ॒र्वा॒ऽवति॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । यत् । वा॒ । पु॒रु । पु॒रु॒ऽभु॒जा॒ । यत् । अ॒न्तरि॑क्षे । आ । ग॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
यदद्य स्थः परावति यदर्वावत्यश्विना। यद्वा पुरू पुरुभुजा यदन्तरिक्ष आ गतम् ॥

यत्। अद्य। स्थः। पराऽवति। यत्। अर्वाऽवति। अश्विना। यत्। वा। पुरु। पुरुऽभुजा। यत्। अन्तरिक्षे। आ। गतम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 11 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्री पुरुषो ! (यत्) जो (अश्विना) वायु और बिजुली (परावति) दूर देश में और (यत्) जो (अर्वावति) निकट देश में (यत्) जो (पुरुभुजा) बहुतों के पालन करनेवाले (वा) वा (यत्) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (पुरू) बहुत (स्थः) स्थित होते हैं, उनके विज्ञान के लिये (अद्य) आज (आ, गतम्) आइये ॥१॥
Essence
जो ब्रह्मचर्य्य से विद्या को पढ़कर परस्पर प्रीति से गृहारम्भ करें, वे स्त्री-पुरुष शिल्प विद्या को भी सिद्ध कर सकें ॥१॥
Subject
अब दश ऋचावाले तिहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में फिर स्त्री-पुरुष कैसे वर्त्तें, इस विषय को कहते हैं ॥