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Rigveda Mandal 5 / Sukta 72 / Mantra 3

87 Sukta
3 Mantra
5/72/3
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- बाहुवृक्त आत्रेयः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
मि॒त्रश्च॑ नो॒ वरु॑णश्च जु॒षेतां॑ य॒ज्ञमि॒ष्टये॑। नि ब॒र्हिषि॑ सदतं॒ सोम॑पीतये ॥३॥

मि॒त्रः । च॒ । नः॒ । वरु॑णः । च॒ । जु॒षेता॑म् । य॒ज्ञम् । इ॒ष्टये॑ । नि । ब॒र्हिषि॑ । स॒द॒त॒म् । सोम॑ऽपीतये ॥

Mantra without Swara
मित्रश्च नो वरुणश्च जुषेतां यज्ञमिष्टये। नि बर्हिषि सदतं सोमपीतये ॥

मित्रः। च। नः। वरुणः। च। जुषेताम्। यज्ञम्। इष्टये। नि। बर्हिषि। सदतम्। सोमऽपीतये ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्री पुरुषो ! जैसे (मित्रः) मित्र (च) और (वरुणः) स्वीकार करते योग्य जन (च) भी (इष्टये) इष्ट सुख के लिये और (सोमपीतये) सोमरस के पान के लिये (नः) हम लोगों के (यज्ञम्) यज्ञ का (जुषेताम्) सेवन करिये और (बर्हिषि) उत्तम व्यवहार में प्रवृत्त होते हैं, वैसे आप दोनों (नि, सदतम्) स्थिर हूजिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो मित्र के सदृश वर्त्ताव करके वाञ्छित सुख से सिद्ध करने की इच्छा करते हैं, वे गणना करने योग्य होते हैं ॥३॥ इस सूक्त में मित्र और श्रेष्ठ विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह ऋग्वेद में बहत्तरवाँ सूक्त पञ्चम अनुवाक चतुर्थ अष्टक में दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
मनुष्यों को यहाँ कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥