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Rigveda Mandal 5 / Sukta 72 / Mantra 2

87 Sukta
3 Mantra
5/72/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- बाहुवृक्त आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
व्र॒तेन॑ स्थो ध्रु॒वक्षे॑मा॒ धर्म॑णा यात॒यज्ज॑ना। नि ब॒र्हिषि॑ सदतं॒ सोम॑पीतये ॥२॥

व्र॒तेन॑ । स्थः॒ । ध्रु॒वऽक्षे॑मा । धर्म॑णा । या॒त॒यत्ऽज॑ना । नि । ब॒र्हिषि॑ । स॒द॒त॒म् । सोम॑ऽपीतये ॥

Mantra without Swara
व्रतेन स्थो ध्रुवक्षेमा धर्मणा यातयज्जना। नि बर्हिषि सदतं सोमपीतये ॥

व्रतेन। स्थः। ध्रुवऽक्षेमा। धर्मणा। यातयत्ऽजना। नि। बर्हिषि। सदतम्। सोमऽपीतये ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 2

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Meaning
हे (ध्रुवक्षेमा) निश्चित रक्षण और (यातयज्जना) यत्न कराते हुए जनोंवाले मनुष्यो ! जो तुम (धर्म्मणा) धर्म्म के और (व्रतेन) धर्म्मयुक्त कर्म्म के साथ वर्त्तमान (स्थः) होते हो वे दोनों आप (सोमपीतये) सोम पीने के लिये (बर्हिषि) उत्तम व्यवहार में (नि, सदतम्) उपस्थित हूजिये ॥२॥
Essence
जो मनुष्य निश्चित धर्म्म व्रत और शील को धारण करते हैं, वे दृढ़ सुख से युक्त होते हैं ॥२॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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