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Rigveda Mandal 5 / Sukta 71 / Mantra 3

87 Sukta
3 Mantra
5/71/3
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- बाहुवृक्त आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उप॑ नः सु॒तमा ग॑तं॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ दा॒शुषः॑। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥३॥

उप॑ । नः॒ । सु॒तम् । आ । ग॒त॒म् । वरु॑ण । मित्र॑ । दा॒शुषः॑ । अ॒स्य । सोम॑स्य । पी॒तये॑ ॥

Mantra without Swara
उप नः सुतमा गतं वरुण मित्र दाशुषः। अस्य सोमस्य पीतये ॥

उप। नः। सुतम्। आ। गतम्। वरुण। मित्र। दाशुषः। अस्य। सोमस्य। पीतये ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 9 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्र) मित्र (वरुण) श्रेष्ठ ! आप दोनों (अस्य) इस (दाशुषः) देनेवाले के (सोमस्य) बड़ी औषधियों के रस को (पीतये) पीने के लिये (नः) हम लोगों के (सुतम्) उत्पन्न किये हुए पदार्थ के (उप) समीप में (आ, गतम्) आइये ॥३॥
Essence
मनुष्य धार्मिक विद्वानों को बुलाकर सदा उनका सत्कार करें ॥३॥ इस सूक्त में मित्र श्रेष्ठ और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह इकहत्तरवाँ सूक्त और नववाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब विद्वानों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥