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Rigveda Mandal 5 / Sukta 71 / Mantra 1

87 Sukta
3 Mantra
5/71/1
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- उरूचक्रिरात्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ नो॑ गन्तं रिशादसा॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ ब॒र्हणा॑। उपे॒मं चारु॑मध्व॒रम् ॥१॥

आ । नः॒ । ग॒न्त॒म् । रि॒शा॒द॒सा॒ । वरु॑ण । मित्र॑ । ब॒र्हणा॑ । उप॑ । इ॒मम् । चारु॑म् । अ॒ध्व॒रम् ॥

Mantra without Swara
आ नो गन्तं रिशादसा वरुण मित्र बर्हणा। उपेमं चारुमध्वरम् ॥

आ। नः। गन्तम्। रिशादसा। वरुण। मित्र। बर्हणा। उप। इमम्। चारुम्। अध्वरम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 9 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (रिशादसा) दुष्टों के मारनेवाले (वरुण) श्रेष्ठ और (मित्र) मित्र ! (बर्हणा) बढ़ानेवाले आप दोनों (इमम्) इस (नः) हम लोगों के (चारुम्) सुन्दर (अध्वरम्) यज्ञ के (उप) समीप (आ) सब प्रकार से (गन्तम्) प्राप्त होओ ॥१॥
Essence
जो विद्वान् जन व्यवहार नामक यज्ञ को करें तो हम लोगों की उन्नति के लिये समर्थ हों ॥१॥
Subject
अब तीन ऋचावाले एकहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर अध्यापक और उपदेशक क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥