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Rigveda Mandal 5 / Sukta 70 / Mantra 1

87 Sukta
4 Mantra
5/70/1
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- उरूचक्रिरात्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पु॒रू॒रुणा॑ चि॒द्ध्यस्त्यवो॑ नू॒नं वां॑ वरुण। मित्र॒ वंसि॑ वां सुम॒तिम् ॥१॥

पु॒रु॒ऽउ॒रुणा॑ । चि॒त् । हि । अस्ति॑ । अवः॑ । नू॒नम् । वा॒म् । व॒रु॒ण॒ । मित्र॑ । वंसि॑ । वा॒म् । सु॒ऽम॒तिम् ॥

Mantra without Swara
पुरूरुणा चिद्ध्यस्त्यवो नूनं वां वरुण। मित्र वंसि वां सुमतिम् ॥

पुरुऽउरुणा। चित्। हि। अस्ति। अवः। नूनम्। वाम्। वरुण। मित्र। वंसि। वाम्। सुऽमतिम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 8 Mantra » 1

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Meaning
हे (मित्र) मित्र (वरुण) श्रेष्ठ ! (हि) जिससे (वाम्) आप दोनों का जो (पुरूरुणा) अत्यन्त बहुत (नूनम्) निश्चित (अवः) रक्षण आदि (अस्ति) है और जिसको (चित्) निश्चित आप (वंसि) सेवन करते हैं और जो (वाम्) आप दोनों की (सुमतिम्) उत्तम बुद्धि को ग्रहण करता है, उन आप दोनों और उसकी हम लोग सेवा करें ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो रक्षक राजपुरुष प्रजाओं की अत्यन्त रक्षा करते हैं, वे ही प्रजापुरुषों से सेवा करने योग्य हैं ॥१॥
Subject
अब चार ऋचावाले सत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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