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Rigveda Mandal 5 / Sukta 7 / Mantra 4

87 Sukta
10 Mantra
5/7/4
Devata- अग्निः Rishi- इष आत्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स स्मा॑ कृणोति के॒तुमा नक्तं॑ चिद्दू॒र आ स॒ते। पा॒व॒को यद्वन॒स्पती॒न्प्र स्मा॑ मि॒नात्य॒जरः॑ ॥४॥

सः । स्म॒ । कृ॒णो॒ति॒ । के॒तुम् । आ । नक्त॑म् । चि॒त् । दू॒रे । आ । स॒ते । पा॒व॒कः । यत् । वन॒स्पती॑न् । प्र । स्म॒ । मि॒नाति॑ । अ॒जरः॑ ॥

Mantra without Swara
स स्मा कृणोति केतुमा नक्तं चिद्दूर आ सते। पावको यद्वनस्पतीन्प्र स्मा मिनात्यजरः ॥

सः। स्म। कृणोति। केतुम्। आ। नक्तम्। चित्। दूरे। आ। सते। पावकः। यत्। वनस्पतीन्। प्र। स्म। मिनाति। अजरः ॥४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 24 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (अजरः) नाश से रहित (पावकः) पवित्र करनेवाला (वनस्पतीन्) वनों के पालनेवालों का (स्मा) ही (आ, कृणोति) अनुकरण करता (नक्तम्) रात्रि में (चित्) भी (दूरे) दूर देश में (सते) सत्पुरुष के लिये (केतुम्) बुद्धि देता और दूर स्थान में वर्त्तमान हुआ (स्मा) ही दुष्ट और दोषों का (प्र, आ, मिनाति) अच्छे प्रकार नाश करता है (सः) वह सर्वत्र सत्कृत होता है ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! विद्वान् दूर भी वर्त्तमान हुए रात्रि दिन अग्नि वा वनस्पतियों के सदृश परोपकारी होते हैं, वे संसार के भूषण अंलकार होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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