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Rigveda Mandal 5 / Sukta 7 / Mantra 1

87 Sukta
10 Mantra
5/7/1
Devata- अग्निः Rishi- इष आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सखा॑यः॒ सं वः॑ स॒म्यञ्च॒मिषं॒ स्तोमं॑ चा॒ग्नये॑। वर्षि॑ष्ठाय क्षिती॒नामू॒र्जो नप्त्रे॒ सह॑स्वते ॥१॥

सखा॑यः । सम् । वः॒ । स॒म्यञ्च॑म् । इष॑म् । स्तोम॑म् । च॒ । अ॒ग्नये॑ । वर्षि॑ष्ठाय । क्षि॒ती॒नाम् । ऊ॒र्जः । नप्त्रे॑ । सह॑स्वते ॥

Mantra without Swara
सखायः सं वः सम्यञ्चमिषं स्तोमं चाग्नये। वर्षिष्ठाय क्षितीनामूर्जो नप्त्रे सहस्वते ॥

सखायः। सम्। वः। सम्यञ्चम्। इषम्। स्तोमम्। च। अग्नये। वर्षिष्ठाय। क्षितीनाम्। ऊर्जः। नप्त्रे। सहस्वते ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 24 Mantra » 1

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Meaning
हे (सखायः) मित्र हुए आप लोग जो (क्षितीनाम्) मनुष्यों के बीच (वः) आप लोगों के लिये (वर्षिष्ठाय) अत्यन्त वृष्टि करनेवाले के लिये और (ऊर्जः) पराक्रम युक्त के (नप्त्रे) नाती के सदृश वर्त्तमान (सहस्वते) बलयुक्त (अग्नये) अग्नि के लिये (सम्यञ्चम्) श्रेष्ठ (स्तोमम्) प्रशंसा और (इषम्) अन्न आदि को (च) भी (सम्) अच्छे प्रकार धारण करते हैं, उनका सदा सत्कार करो ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! इस संसार में आप लोग मित्रभाव से वर्ताव करके मनुष्य आदि प्रजा के हित के लिये अग्नि आदि की विद्या को प्राप्त होके अन्य जनों के लिये शिक्षा दीजिये ॥१॥
Subject
अब दश ऋचावाले सातवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मित्रता को कहते हैं ॥

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