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Rigveda Mandal 5 / Sukta 69 / Mantra 2

87 Sukta
4 Mantra
5/69/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इरा॑वतीर्वरुण धे॒नवो॑ वां॒ मधु॑मद्वां॒ सिन्ध॑वो मित्र दुह्रे। त्रय॑स्तस्थुर्वृष॒भास॑स्तिसृ॒णां धि॒षणा॑नां रेतो॒धा वि द्यु॒मन्तः॑ ॥२॥

इरा॑ऽवतीः । व॒रु॒ण॒ । धे॒नवः॑ । वा॒म् । मधु॑ऽमत् । वा॒म् । सिन्ध॑वः । मि॒त्र॒ । दु॒ह्रे॒ । त्रयः॑ । त॒स्थुः॒ । वृ॒ष॒भासः॑ । ति॒सॄ॒णाम् । धि॒षणा॑नाम् । रे॒तः॒ऽधाः । वि । द्यु॒ऽमन्तः॑ ॥

Mantra without Swara
इरावतीर्वरुण धेनवो वां मधुमद्वां सिन्धवो मित्र दुह्रे। त्रयस्तस्थुर्वृषभासस्तिसृणां धिषणानां रेतोधा वि द्युमन्तः ॥

इरावतीः। वरुण। धेनवः। वाम्। मधुऽमत्। वाम्। सिन्धवः। मित्र। दुह्रे। त्रयः। तस्थुः। वृषभासः। तिसृणाम्। धिषणानाम्। रेतःऽधाः। वि। द्युऽमन्तः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 7 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वरुण) उत्तम कर्म्म के करनेवाले (मित्र) मित्र ! (वाम्) आप दोनों की जो (इरावतीः) बहुत अन्न आदि सामग्रियाँ (धेनवः) और वाणियाँ गौओं के सदृश (मधुमत्) मधुमान् जैसे हो, वैसे (दुह्रे) अच्छे प्रकार पूरित करती हैं और जो (सिन्धवः) नदियाँ वे (वाम्) आप दोनों को उत्तम प्रकार पूरित करती हैं (तिसृणाम्) तीन प्रकार के (धिषणानाम्) कर्म्म, उपासना और ज्ञान के जाननेवालों के (त्रयः) तीन (द्युमन्तः) उत्तम कामनाओं से युक्त (वृषभासः) वर्षानेवाले (रेतोधाः) और जो वीर्य्य को धारण करता है वह (वि) विशेष करके (तस्थुः) स्थित होते हैं, उनको आप दोनों संप्रयुक्त करिये ॥२॥
Essence
हे सब के मित्र जनो ! आप लोग गौ के सदृश सुख के देनेवाले, नदी के सदृश मल के दूर करने, बुद्धि के देने और कामनाओं की सिद्धि के देनेवाले हूजिये ॥२॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥