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Rigveda Mandal 5 / Sukta 69 / Mantra 1

87 Sukta
4 Mantra
5/69/1
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्री रो॑च॒ना व॑रुण॒ त्रीँरु॒त द्यून्त्रीणि॑ मित्र धारयथो॒ रजां॑सि। वा॒वृ॒धा॒नाव॒मतिं॑ क्ष॒त्रिय॒स्यानु॑ व्र॒तं रक्ष॑माणावजु॒र्यम् ॥१॥

त्री । रो॒च॒ना । व॒रु॒ण॒ । त्रीन् । उ॒त । द्यून् । त्रीणि॑ । मि॒त्र॒ । धा॒र॒य॒थः॒ । रजां॑सि । व॒वृ॒धा॒नौ । अ॒मति॑म् । क्ष॒त्रिय॑स्य । अनु॑ । व्र॒तम् । रक्ष॑माणौ । अ॒जु॒र्यम् ॥

Mantra without Swara
त्री रोचना वरुण त्रीँरुत द्यून्त्रीणि मित्र धारयथो रजांसि। वावृधानावमतिं क्षत्रियस्यानु व्रतं रक्षमाणावजुर्यम् ॥

त्री। रोचना। वरुण। त्रीन्। उत। द्यून्। त्रीणि। मित्र। धारयथः। रजांसि। ववृधानौ। अमतिम्। क्षत्रियस्य। अनु। व्रतम्। रक्षमाणौ। अजुर्यम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 7 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्र) प्राणवायु के और (वरुण) उदानवायु के सदृश वर्त्तमान ! जैसे प्राण और उदानवायु वा (त्री) तीन अर्थात् भूमि, बिजुली और सूर्य्य रूप अग्नि जो (रोचना) प्रकाश होने योग्य उनको और (त्रीन्) तीन (द्यून्) प्रकाशों (उत) और (त्रीणि) प्रकाशित होने योग्य (रजांसि) लोकों को (वावृधानौ) बढ़ाते हुए (क्षत्रियस्य) राजपूत राजा के (अमतिम्) रूप को और (अजुर्य्यम्) नहीं जीर्ण हुए (अनु, व्रतम्) कर्म वा स्वभाव को (रक्षमाणौ) रक्षा करते हुए धारण करते हैं, वैसे इन दोनों को आप दोनों (धारयथः) धारण करते हैं ॥१॥
Essence
इस संसार में तीन प्रकार का प्रकाश है-एक सूर्य का, दूसरा बिजुली का, तीसरा पृथिवी में वर्त्तमान अग्नि का उन तीनों को जो क्षत्रिय आदि जानें, वे अक्षय राज्य करने को समर्थ होवें ॥१॥
Subject
अब चार ऋचावाले उनहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इस संसार में मनुष्यों को क्या जान कर क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥