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Rigveda Mandal 5 / Sukta 68 / Mantra 4

87 Sukta
5 Mantra
5/68/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ॒तमृ॒तेन॒ सप॑न्तेषि॒रं दक्ष॑माशाते। अ॒द्रुहा॑ दे॒वौ व॑र्धेते ॥४॥

ऋ॒तम् । ऋ॒तेन॑ । सप॑न्ता । इ॒षि॒रम् । दक्ष॑म् । आ॒शा॒ते॒ इति॑ । अ॒द्रुहा॑ । दे॒वौ । व॒र्धे॒ते॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
ऋतमृतेन सपन्तेषिरं दक्षमाशाते। अद्रुहा देवौ वर्धेते ॥

ऋतम्। ऋतेन। सपन्ता। इषिरम्। दक्षम्। आशाते इति। अद्रुहा। देवौ। वर्धेते इति ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 6 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (ऋतेन) सत्य से (ऋतम्) सत्य का (सपन्ता) आक्रोश करते हुए (इषिरम्) प्राप्त होने योग्य (दक्षम्) बल को (आशाते) व्याप्त होते हैं और (अद्रुहा) द्वेष से रहित (देवौ) दो विद्वान् जन (वर्धते) वृद्धि को प्राप्त होते हैं, वैसे आप लोग भी प्रयत्न करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के सदृश क्रिया करके सदा ही वृद्धि करें ॥४॥
Subject
विद्वानों के सदृश इतरजनों को वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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