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Rigveda Mandal 5 / Sukta 68 / Mantra 3

87 Sukta
5 Mantra
5/68/3
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता नः॑ शक्तं॒ पार्थि॑वस्य म॒हो रा॒यो दि॒व्यस्य॑। महि॑ वां क्ष॒त्रं दे॒वेषु॑ ॥३॥

ता । नः॒ । शक्त॑म् । पार्थि॑वस्य । म॒हः । रा॒यः । दि॒व्यस्य॑ । महि॑ । वा॒म् । क्ष॒त्रम् । दे॒वेषु॑ ॥

Mantra without Swara
ता नः शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य। महि वां क्षत्रं देवेषु ॥

ता। नः। शक्तम्। पार्थिवस्य। महः। रायः। दिव्यस्य। महि। वाम्। क्षत्रम्। देवेषु ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (नः) हम लोगों के सम्बन्ध में (पार्थिवस्य) पृथिवी में विदित (महः) बड़े (रायः) धन के और (दिव्यस्य) शुद्ध व्यवहार में हुए का (शक्तम्) समर्थ, जिन (वाम्) आप दोनों का (देवेषु) सत्य विद्या को प्राप्त हुओं में (महि) बड़ा (क्षत्रम्) राज्य वा धन वर्त्तमान है (ता) उन आप दोनों का हम लोग सत्कार करें ॥३॥
Essence
हे राजपुरुषो ! आप लोग जो अपने राज्य वा विद्वानों से रक्षा करें तो वह पृथिवी में विदित हुआ समर्थ होवे ॥३॥
Subject
फिर राज्य कैसे उन्नति को प्राप्त करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥