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Rigveda Mandal 5 / Sukta 68 / Mantra 2

87 Sukta
5 Mantra
5/68/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स॒म्राजा॒ या घृ॒तयो॑नी मि॒त्रश्चो॒भा वरु॑णश्च। दे॒वा दे॒वेषु॑ प्रश॒स्ता ॥२॥

स॒म्ऽराजा॑ । या । घृ॒तयो॑नी॒ इति॑ घृ॒तऽयो॑नी । मि॒त्रः । च॒ । उ॒भा । वरु॑णः । च॒ । दे॒वा । दे॒वेषु॑ । प्र॒ऽश॒स्ता ॥

Mantra without Swara
सम्राजा या घृतयोनी मित्रश्चोभा वरुणश्च। देवा देवेषु प्रशस्ता ॥

सम्ऽराजा। या। घृतयोनी इति घृतऽयोनी। मित्रः। च। उभा। वरुणः। च। देवा। देवेषु। प्रऽशस्ता ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 6 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (या) जो (घृतयोनी) घृतयोनी अर्थात् जल कारण जिनका वे (देवेषु) विद्वानों में (प्रशस्ता) श्रेष्ठ (सम्राजा) उत्तम प्रकार शोभित होनेवाले (देवा) दो विद्वान् अर्थात् (मित्रः) मित्र (च) और (वरुणः) स्वीकार करने योग्य (च) भी (उभा) दोनों प्रवृत्त होते हैं, उन दोनों को आप लोग बहुत आदर करिये ॥२॥
Essence
जो विद्वानों में विद्वान् राजपुरुष चक्रवर्त्तिराज्य को सिद्ध कर सकते हैं, वे ही यशस्वी होते हैं ॥२॥
Subject
मनुष्यो को यहाँ कैसे होना चाहिए, इस विषय को कहते हैं ॥

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