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Rigveda Mandal 5 / Sukta 67 / Mantra 4

87 Sukta
5 Mantra
5/67/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ते हि स॒त्या ऋ॑त॒स्पृश॑ ऋ॒तावा॑नो॒ जने॑जने। सु॒नी॒थासः॑ सु॒दान॑वों॒ऽहोश्चि॑दुरु॒चक्र॑यः ॥४॥

ते । हि । स॒त्याः । ऋ॒त॒ऽस्पृशः॑ । ऋ॒तऽवा॑नः । जने॑ऽजने । सु॒ऽनी॒थासः॑ । सु॒ऽदान॑वः । अं॒होः । चि॒त् । उ॒रु॒ऽचक्र॑यः ॥

Mantra without Swara
ते हि सत्या ऋतस्पृश ऋतावानो जनेजने। सुनीथासः सुदानवोंऽहोश्चिदुरुचक्रयः ॥

ते। हि। सत्याः। ऋतऽस्पृशः। ऋतऽवानः। जनेऽजने। सुऽनीथासः। सुऽदानवः। अंहोः। चित्। उरुऽचक्रयः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (हि) जिससे (जनेजने) मनुष्य मनुष्य में जो (सत्याः) श्रेष्ठों में श्रेष्ठ (ऋतस्पृशः) यथार्थ को स्वीकार करनेवाले (ऋतावानः) सत्य मत वा कर्म्म विद्यमान जिनमें वे (सुदानवः) सुन्दर श्रेष्ठ विद्या आदि का दान जिनका और (सुनीथासः) उत्तम नीति के देने और (उरुचक्रयः) बहुत करनेवाले बड़े पुरुषार्थी हुए (अंहोः) अपराध से (चित्) भी (पृथक्) हुए होवें (ते) वे सर्वदा सब प्रकार से सत्कार करने योग्य हों ॥४॥
Essence
जो स्वयं धर्मयुक्त गुण, कर्म और स्वभाववाले हुए दुष्ट आचरण से पृथक् वर्त्ताव करके अन्य मनुष्यों को तादृश अर्थात् अपने समान करते हैं, वे धन्यवाद के योग्य हैं ॥४॥
Subject
फिर विद्वान् कैसे होकर क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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