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Rigveda Mandal 5 / Sukta 67 / Mantra 1

87 Sukta
5 Mantra
5/67/1
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- रातहव्य आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
बळि॒त्था दे॑वा निष्कृ॒तमादि॑त्या यज॒तं बृ॒हत्। वरु॑ण॒ मित्रार्य॑म॒न्वर्षि॑ष्ठं क्ष॒त्रमा॑शाथे ॥१॥

बट् । इ॒त्था । दे॒व॒ । निः॒ऽकृ॒तम् । आदि॑त्या । य॒ज॒तम् । बृ॒हत् । वरु॑ण । मित्र॑ । अर्य॑मन् । वर्षि॑ष्ठम् । क्ष॒त्रम् । आ॒शा॒थे॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
बळित्था देवा निष्कृतमादित्या यजतं बृहत्। वरुण मित्रार्यमन्वर्षिष्ठं क्षत्रमाशाथे ॥

बट्। इत्था। देवा। निःऽकृतम्। आदित्या। यजतम्। बृहत्। वरुण। मित्र। अर्यमन्। वर्षिष्ठम्। क्षत्रम्। आशाथे इति ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 1

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Meaning
हे (देवा) श्रेष्ठ स्वभाववाले (आदित्या) अविनाशी (मित्र) मित्र (वरुण) श्रेष्ठ ! आप दोनों (बृहत्) बड़े (निष्कृतम्) उत्पन्न हुए को (यजतम्) उत्तम प्रकार मिलो, हे (अर्य्यमन्) न्यायकारी ! (इत्था) इस प्रकार से आप भी मिलिये और हे मित्र श्रेष्ठ जनो ! तुम जैसे (बट्) सत्य (वर्षिष्ठम्) अत्यन्त बढ़े हुए (क्षत्रम्) राज्य वा धन को (आशाथे) प्राप्त होते हो, वैसे इसको न्यायकारी भी प्राप्त हो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे विद्वान् जन इस संसार में धर्म्म युक्त कर्म्मों को करें, वैसे राज्य का राजा आदि पालन करें ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले सड़सठवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को किसके तुल्य क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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