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Rigveda Mandal 5 / Sukta 66 / Mantra 6

87 Sukta
6 Mantra
5/66/6
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- रातहव्य आत्रेयः Chhanda- स्वराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ यद्वा॑मीयचक्षसा॒ मित्र॑ व॒यं च॑ सू॒रयः॑। व्यचि॑ष्ठे बहु॒पाय्ये॒ यते॑महि स्व॒राज्ये॑ ॥६॥

आ । यत् । वा॒म् । ई॒य॒ऽच॒क्ष॒सा॒ । मित्रा॑ । व॒यम् । च॒ । सू॒रयः॑ । व्यचि॑ष्ठे । ब॒हु॒ऽपाय्ये॑ । यते॑महि । स्व॒ऽराज्ये॑ ॥

Mantra without Swara
आ यद्वामीयचक्षसा मित्र वयं च सूरयः। व्यचिष्ठे बहुपाय्ये यतेमहि स्वराज्ये ॥

आ। यत्। वाम्। ईयऽचक्षसा। मित्रा। वयम्। च। सूरयः। व्यचिष्ठे। बहुऽपाय्ये। यतेमहि। स्वऽराज्ये ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 6

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Meaning
हे (ईयचक्षसा) प्राप्त होने वा जानने योग्य दर्शन वा कथन जिनका वे (मित्रा) मित्र (वाम्) आप दोनों के (यत्) जिस (व्यचिष्ठे) अत्यन्त व्याप्त और (बहुपाय्ये) बहुतों से रक्षा करने योग्य राज्य (स्वराज्ये, च) और अपने राज्य में (सूरयः) विद्वान् जन (वयम्) हम लोग (आ) सब प्रकार से (यतेमहि) यत्न करें, उसमें यत्न करो ॥६॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि मित्रता करके अपने और दूसरे के राज्य की न्याय से रक्षा करके धर्म की उन्नति करें ॥६॥ इस सूक्त में मित्र और श्रेष्ठ विद्वान् के और विद्यायुक्त स्त्री के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छासठवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
मनुष्यों को न्याय से राज्य की रक्षा करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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