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Rigveda Mandal 5 / Sukta 66 / Mantra 3

87 Sukta
6 Mantra
5/66/3
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- रातहव्य आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ता वा॒मेषे॒ रथा॑नामु॒र्वीं गव्यू॑तिमेषाम्। रा॒तह॑व्यस्य सुष्टु॒तिं द॒धृक्स्तोमै॑र्मनामहे ॥३॥

ता । वा॒म् । एषे॑ । रथा॑नाम् । उ॒र्वीम् । गव्यू॑तिम् । ए॒षा॒म् । रा॒तऽह॑व्यस्य । सु॒ऽस्तु॒तिम् । द॒धृक् । स्तोमैः॑ । म॒ना॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
ता वामेषे रथानामुर्वीं गव्यूतिमेषाम्। रातहव्यस्य सुष्टुतिं दधृक्स्तोमैर्मनामहे ॥

ता। वाम्। एषे। रथानाम्। उर्वीम्। गव्यूतिम्। एषाम्। रातऽहव्यस्य। सुऽस्तुतिम्। दधृक्। स्तोमैः। मनामहे ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे अध्यापक और उपदेशक जन ! आप दोनों (एषाम्) इन (रथानाम्) विमान आदि वाहनों का (रातहव्यस्य) दिया है देने योग्य पदार्थ जिसने उसको (सुष्टुतिम्) उत्तम प्रशंसा को और (गव्यूतिम्) मार्ग को (एषे) प्राप्त होने को प्रवृत्त होते हैं, और जैसे विद्वान् जन (स्तोमैः) प्रशंसाओं से इन की (उर्वीम्) पृथिवी को धारण करता है, वैसे (ता) उन (दधृक्) प्रगल्भता को प्राप्त (वाम्) आप दोनों को और उस विद्वान् को हम लोग (मनामहे) अच्छे प्रकार जानते हैं ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो जगत् के कल्याण के लिये सृष्टिक्रम से पदार्थविद्या को प्रकाशित करते हैं, वे धन्य होते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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