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Rigveda Mandal 5 / Sukta 65 / Mantra 6

87 Sukta
6 Mantra
5/65/6
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- रातहव्य आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यु॒वं मि॑त्रे॒मं जनं॒ यत॑थः॒ सं च॑ नयथः। मा म॒घोनः॒ परि॑ ख्यतं॒ मो अ॒स्माक॒मृषी॑णां गोपी॒थे न॑ उरुष्यतम् ॥६॥

यु॒वम् । मि॒त्रा॒ । इ॒मम् । जन॑म् । यत॑थः । सम् । च॒ । न॒य॒थः॒ । मा । म॒घोनः॑ । परि॑ । ख्य॒त॒म् । मो इति॑ । अ॒स्माक॑म् । ऋषी॑णाम् । गो॒ऽपी॒थे । नः॒ । उ॒रु॒ष्य॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
युवं मित्रेमं जनं यतथः सं च नयथः। मा मघोनः परि ख्यतं मो अस्माकमृषीणां गोपीथे न उरुष्यतम् ॥

युवम्। मित्रा। इमम्। जनम्। यतयः। सम्। च। नयथः। मा। मघोनः। परि। ख्यतम्। मो इति। अस्माकम्। ऋषीणाम्। गोऽपीथे। नः। उरुष्यतम् ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्रा) प्राण और उदान के समान वर्त्तमान अध्यापक और उपदेशक जनो ! (युवम्) आप दोनों (इमम्) इस (जनम्) उपदेश देने योग्य जन को (यतथः) प्रेरणा करते और (सम्, नयथः, च) प्राप्त कराते हैं तथा (मघोनः) बहुत धनों से युक्त (नः) हम लोगों का (मा) मत (परि, ख्यतम्) निरादर कीजिये और (ऋषीणाम्) वेदार्थ के जाननेवाले (अस्माकम्) हम लोगों का (गोपीथे) गौओं के पीने योग्य दुग्ध आदि में (मो) नहीं निरादर करिये और शुभ कर्म में हम लोगों को (उरुष्यतम्) प्रेरणा करिये ॥६॥
Essence
हे विद्वानो ! आप लोग सब लोगों को प्रयत्न से युक्त करके सुख को प्राप्त कराइये और हे विद्यार्थीजनो वा श्रोतृजनो ! आप लोग हम अध्यापक और उपदेशकों का अपमान मत करो, इस प्रकार वर्त्ताव कर सत्य धर्म का सेवन हम लोग करें ॥६॥ इस सूक्त में मित्रावरुणपदवाच्य अध्यापक और अध्ययन करने तथा उपदेश करने और उपदेश देने योग्यों के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पैंसठवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥