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Rigveda Mandal 5 / Sukta 65 / Mantra 3

87 Sukta
6 Mantra
5/65/3
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- रातहव्य आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ता वा॑मिया॒नोऽव॑से॒ पूर्वा॒ उप॑ ब्रुवे॒ सचा॑। स्वश्वा॑सः॒ सु चे॒तुना॒ वाजाँ॑ अ॒भि प्र दा॒वने॑ ॥३॥

ता । वा॒म् । इ॒या॒नः । अव॑से । पूर्वौ॑ । उप॑ । ब्रुवे॑ । सचा॑ । सु॒ऽअश्वा॑सः । सु । चे॒तुना॑ । वाजा॑न् । अ॒भि । प्र । दा॒वने॑ ॥

Mantra without Swara
ता वामियानोऽवसे पूर्वा उप ब्रुवे सचा। स्वश्वासः सु चेतुना वाजाँ अभि प्र दावने ॥

ता। वाम्। इयानः। अवसे। पूर्वौ। उप। ब्रुवे। सचा। सुऽअश्वासः। सु। चेतुना। वाजान्। अभि। प्र। दावने ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 3

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Meaning
हे प्राण और उदान के समान वर्तमानो ! (स्वश्वासः) अच्छे घोड़े जिनके ये (सु, चेतुना) उत्तम ज्ञानवान् के साथ (दावने) देनेवाले के लिये (वाजान्) संग्रामों के (अभि, प्र) सम्मुख अच्छे प्रकार कहें उनको मैं (उप, ब्रुवे) समीप में कहूँ। हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! जिन (पूर्वौ) प्रथम विद्या पढ़े हुए (वाम्) आप दोनों को (इयानः) प्राप्त होता हुआ (अवसे) रक्षा आदि के लिये वर्त्तमान हूँ (ता) उन (सचा) मिले हुओं के मैं समीप में कहता हूँ ॥३॥
Essence
जैसे उपदेशक जन उपदेश देवें, वैसे ही जिनको उपदेश दिया जाये वे औरों को भी उपदेश करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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