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Rigveda Mandal 5 / Sukta 65 / Mantra 2

87 Sukta
6 Mantra
5/65/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- अर्चनाना आत्रेयः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ता हि श्रेष्ठ॑वर्चसा॒ राजा॑ना दीर्घ॒श्रुत्त॑मा। ता सत्प॑ती ऋता॒वृध॑ ऋ॒तावा॑ना॒ जने॑जने ॥२॥

ता । हि । श्रेष्ठ॑ऽवर्चसा । राजा॑ना । दी॒र्घ॒श्रुत्ऽत॑मा । ता । सत्प॑ती॒ इति॒ सत्ऽप॑ती । ऋ॒त॒ऽवृधा॑ । ऋ॒तऽवा॑ना । जने॑ऽजने ॥

Mantra without Swara
ता हि श्रेष्ठवर्चसा राजाना दीर्घश्रुत्तमा। ता सत्पती ऋतावृध ऋतावाना जनेजने ॥

ता। हि। श्रेष्ठऽवर्चसा। राजाना। दीर्घश्रुत्ऽतमा। ता। सत्पती इति सत्ऽपती। ऋतऽवृधा। ऋतऽवाना। जनेऽजने ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (दीर्घश्रुत्तमा) दीर्घकालपर्यन्त अत्यन्त शास्त्र को सुननेवाले (श्रेष्ठवर्चसा) श्रेष्ठ अध्ययन जिनका ऐसे (राजाना) प्रकाशमान जन वर्त्तमान हैं (ता) वे दोनों और जो (जनेजने) मनुष्य मनुष्य में (सत्पती) श्रेष्ठों के पालन करने और (ऋतावृधा) सत्य को बढ़ानेवाले (ऋतावाना) तथा सत्य विद्यमान जिनमें (ता, हि) उन्हीं दोनों का हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥२॥
Essence
जो मनुष्य बहुश्रुत, पूर्ण विद्यावाले, सत्य धर्म्म में निष्ठा करनेवाले और जो विद्या की प्रवृत्ति में प्रीति करनेवाले हों, वे ही उपदेशक अध्यापक होवें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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