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Rigveda Mandal 5 / Sukta 65 / Mantra 1

87 Sukta
6 Mantra
5/65/1
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- अर्चनाना आत्रेयः Chhanda- निच्रृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यश्चि॒केत॒ स सु॒क्रतु॑र्देव॒त्रा स ब्र॑वीतु नः। वरु॑णो॒ यस्य॑ दर्श॒तो मि॒त्रो वा॒ वन॑ते॒ गिरः॑ ॥१॥

यः । चि॒केत॑ । सः । सु॒ऽक्रतुः॑ । दे॒व॒ऽत्रा । सः । ब्र॒वी॒तु॒ । नः॒ । वरु॑णः । यस्य॑ । द॒र्श॒तः । मि॒त्रः । वा॒ । वन॑ते । गिरः॑ ॥

Mantra without Swara
यश्चिकेत स सुक्रतुर्देवत्रा स ब्रवीतु नः। वरुणो यस्य दर्शतो मित्रो वा वनते गिरः ॥

यः। चिकेत। सः। सुऽक्रतुः। देवऽत्रा। सः। ब्रवीतु। नः। वरुणः। यस्य। दर्शतः। मित्रः। वा। वनते। गिरः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 1

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Meaning
(यः) जो (सुक्रतुः) उत्तम प्रकार बुद्धिमान् और (वरुणः) श्रेष्ठ है (सः) वह (चिकेत) जाने और जो (देवत्रा) विद्वानों में विद्वान् है (सः) वह (नः) हम लोगों को (ब्रवीतु) कहे (वा) वा (यस्य) जिसका (दर्शतः) देखने के योग्य (मित्रः) मित्र है वह हम लोगों की (गिरः) वाणियों को (वनते) पालन करता है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो हम लोगों के मध्य में अधिक विद्वान् होवे, वही उपदेश करे और जो अधिक ज्ञानवान् होवे, वह सत्य और असत्य को अलग करे ॥१॥
Subject
अब छः ऋचावाले पैंसठवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मित्रावरुण पदवाच्य पढ़ने पढ़ानेवाले वा उपदेश योग्य वा उपदेश देनेवालों के विषय को कहते हैं ॥

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