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Rigveda Mandal 5 / Sukta 64 / Mantra 7

87 Sukta
7 Mantra
5/64/7
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- अर्चनाना आत्रेयः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उ॒च्छन्त्यां॑ मे यज॒ता दे॒वक्ष॑त्रे॒ रुश॑द्गवि। सु॒तं सोमं॒ न ह॒स्तिभि॒रा प॒ड्भिर्धा॑वतं नरा॒ बिभ्र॑तावर्च॒नान॑सम् ॥७॥

उ॒च्छन्त्या॑म् । मे॒ । य॒ज॒ता । दे॒वऽक्ष॑त्रे । रुश॑त्ऽगवि । सु॒तम् । सोम॑म् । न । ह॒स्तिऽभिः॑ । आ । प॒ट्ऽभिः । धा॒व॒त॒म् । न॒रा॒ । बिभ्र॑तौ । अ॒र्च॒नान॑सम् ॥

Mantra without Swara
उच्छन्त्यां मे यजता देवक्षत्रे रुशद्गवि। सुतं सोमं न हस्तिभिरा पड्भिर्धावतं नरा बिभ्रतावर्चनानसम् ॥

उच्छन्त्याम्। मे। यजता। देवऽक्षत्रे। रुशत्ऽगवि। सुतम्। सोमम्। न। हस्तिऽभिः। आ। पट्ऽभिः। धावतम्। नरा। बिभ्रतौ। अर्चनानसम् ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 7

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Meaning
हे प्राण और उदान वायु के सदृश वर्त्तमान (यजता) मिलनेवाले (नरा) नायक राजा और मन्त्रीजन ! आप दोनों (उच्छन्त्याम्) विवास करती हुई में तथा (रुशद्गवि) प्रकाशमान किरणों से युक्त (देवक्षत्रे) विद्वानों के धन वा राज्य में (सुतम्) उत्पन्न किये गये (सोमम्) ऐश्वर्य को (हस्तिभिः) हाथियों से (न) जैसे वैसे (पड्भिः) पैरों से (धावतम्) प्राप्त होओ और (अर्चनानसम्) श्रेष्ठ नासिका जिसकी उसको (बिभ्रतौ) धारण करते हुए (मे) मेरे उत्पन्न किये गये ऐश्वर्य को (आ) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये ॥७॥
Essence
हे पुरुषार्थी राजजनो ! प्रजाओं का न्याय से पालन करके विद्वानों के धन को प्राप्त होओ ॥७॥ इस सूक्त में प्राण और उदान के सदृश वर्तमान तथा विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चौसठवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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