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Rigveda Mandal 5 / Sukta 64 / Mantra 2

87 Sukta
7 Mantra
5/64/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- अर्चनाना आत्रेयः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ता बा॒हवा॑ सुचे॒तुना॒ प्र य॑न्तमस्मा॒ अर्च॑ते। शेवं॒ हि जा॒र्यं॑ वां॒ विश्वा॑सु॒ क्षासु॒ जोगु॑वे ॥२॥

ता । बा॒हवा॑ । सु॒ऽचे॒तुना॑ । प्र । य॒न्त॒म् । अ॒स्मै॒ । अर्च॑ते । शेव॑म् । हि । जा॒र्य॑म् । वा॒म् । विश्वा॑सु । क्षासु॑ । जोगु॑वे ॥

Mantra without Swara
ता बाहवा सुचेतुना प्र यन्तमस्मा अर्चते। शेवं हि जार्यं वां विश्वासु क्षासु जोगुवे ॥

ता। बाहवा। सुऽचेतुना। प्र। यन्तम्। अस्मै। अर्चते। शेवम्। हि। जार्यम्। वाम्। विश्वासु। क्षासु। जोगुवे ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे प्राण और उदान वायु के सदृश वर्त्तमानो ! (ता) वे दोनों आप (बाहवा) बाहु और (सुचेतुना) उत्तम विज्ञान से (अस्मै) इस (अर्चते) सत्कार करनेवाले जन के लिये (शेवम्) सुख को (हि) ही (प्र, यन्तम्) प्रयत्न करते हुए (वाम्) आप दोनों का (जार्यम्) जरा वृद्धावस्था में उत्पन्न विषय का मैं (विश्वासु) सम्पूर्ण (क्षासु) भूमियों में (जोगुवे) उपदेश करता हूँ, वैसे उसकी आप लोग प्रशंसा करो ॥२॥
Essence
जो मनुष्य सब पृथिवी पर विद्या और बाहुबल से उत्तम पुरुषों के लिये सुख देते हैं, उनके लिये हम लोग भी सुख देवें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥