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Rigveda Mandal 5 / Sukta 63 / Mantra 7

87 Sukta
7 Mantra
5/63/7
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- अर्चनाना आत्रेयः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
धर्म॑णा मित्रावरुणा विपश्चिता व्र॒ता र॑क्षेथे॒ असु॑रस्य मा॒यया॑। ऋ॒तेन॒ विश्वं॒ भुव॑नं॒ वि रा॑जथः॒ सूर्य॒मा ध॑त्थो दि॒वि चित्र्यं॒ रथ॑म् ॥७॥

धर्म॑णा । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । वि॒पः॒ऽचि॒ता॒ । व्र॒ता । र॒क्षे॒थे॒ इति॑ । असु॑रस्य । मा॒यया॑ । ऋ॒तेन॑ । विश्व॑म् । भुव॑नम् । वि । रा॒ज॒थः॒ । सूर्य॑म् । आ । ध॒त्थः॒ । दि॒वि । चित्र्य॑म् । रथ॑म् ॥

Mantra without Swara
धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेथे असुरस्य मायया। ऋतेन विश्वं भुवनं वि राजथः सूर्यमा धत्थो दिवि चित्र्यं रथम् ॥

धर्मणा। मित्रावरुणा। विपःऽचिता। व्रता। रक्षेथे इति। असुरस्य। मायया। ऋतेन। विश्वम्। भुवनम्। वि। राजथः। सूर्यम्। आ। धत्थः। दिवि। चित्र्यम्। रथम् ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विपश्चिताः) विद्वान् (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश वर्त्तमानो ! जिससे आप दोनों (असुरस्य) मेघ के (मायया) आडम्बर से और (धर्मणा) धर्म से (व्रता) सत्यभाषण आदि व्रतों की (रक्षेथे) रक्षा करते हैं तथा (ऋतेन) यथार्थ से (विश्वम्) प्रविष्ट होते हैं (भुवनम्) वा होते हैं जिसमें उस सम्पूर्ण जगत् को (वि, राजथः) विशेष करके प्रकाशित करते हैं और (दिवि) प्रकाश में (सूर्यम्) सूर्य के सदृश (चित्र्यम्) अद्भुत में हुए (रथम्) वाहन को (आ, धत्थः) धारण करते हैं, इससे सत्कार करने के योग्य होते हैं ॥७॥
Essence
जो मनुष्य धर्मसम्बन्धी सत्यभाषण आदि व्रत वा कर्मों को करते हैं, वे सूर्य के सदृश सत्य से प्रकाशित होते हैं ॥७॥ इस सूक्त में मित्रावरुण और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह त्रेसठवाँ सूक्त और पहिला वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥