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Rigveda Mandal 5 / Sukta 63 / Mantra 4

87 Sukta
7 Mantra
5/63/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- अर्चनाना आत्रेयः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
मा॒या वां॑ मित्रावरुणा दि॒वि श्रि॒ता सूर्यो॒ ज्योति॑श्चरति चि॒त्रमायु॑धम्। तम॒भ्रेण॑ वृ॒ष्ट्या गू॑हथो दि॒वि पर्ज॑न्य द्र॒प्सा मधु॑मन्त ईरते ॥४॥

मा॒या । वा॒म् । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । दि॒वि । श्रि॒ता । सूर्यः॑ । ज्योतिः॑ । च॒र॒ति॒ । चि॒त्रम् । आयु॑धम् । तम् । अ॒भ्रेण॑ । वृ॒ष्ट्या । गू॒ह॒थः॒ । दि॒वि । पर्ज॑न्य । द्र॒प्सा । मधु॑ऽमन्तः । ई॒र॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
माया वां मित्रावरुणा दिवि श्रिता सूर्यो ज्योतिश्चरति चित्रमायुधम्। तमभ्रेण वृष्ट्या गूहथो दिवि पर्जन्य द्रप्सा मधुमन्त ईरते ॥

माया। वाम्। मित्रावरुणा। दिवि। श्रिता। सूर्यः। ज्योतिः। चरति। चित्रम्। आयुधम्। तम्। अभ्रेण। वृष्ट्या। गूहथः। दिवि। पर्जन्य। द्रप्साः। मधुऽमन्तः। ईरते ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 4

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Meaning
हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के सदृश वर्त्तमान राजा और मन्त्रीजनो ! (वाम्) आप दोनों की (दिवि) बिजुली में (श्रिता) आश्रित (माया) बुद्धि (सूर्य्यः) सूर्य्य के सदृश जिस (ज्योतिः) प्रकाश रूप (चित्रम्) अद्भुत (आयुधम्) युद्ध करते हैं जिससे उस शस्त्र को (चरति) प्राप्त होती है (तम्) उसको (अभ्रेण) मेघ से और (वृष्ट्या) वृष्टि से (गूहथः) घेरते हो, हे (पर्जन्य) मेघ के समान वर्तमान जन ! (दिवि) सूर्य्य के प्रकाश में (मधुमन्तः) बहुत मधुर कर्म्म विद्यमान जिनके वे (द्रप्साः) विमोह के करनेवाले (ईरते) चलते वा कंपते हैं, वैसे आप जानिये ॥४॥
Essence
जो राजा और मन्त्री जन सूर्य्य और चन्द्रमा के सदृश तीव्र और शान्तस्वभाववाले, बुद्धिमान्, वृष्टि के सदृश प्रजाओं का पालन करते हैं, वे सब काल में सुख की वृद्धि करते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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