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Rigveda Mandal 5 / Sukta 63 / Mantra 3

87 Sukta
7 Mantra
5/63/3
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- अर्चनाना आत्रेयः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स॒म्राजा॑ उ॒ग्रा वृ॑ष॒भा दि॒वस्पती॑ पृथि॒व्या मि॒त्रावरु॑णा॒ विच॑र्षणी। चि॒त्रेभि॑र॒भ्रैरुप॑ तिष्ठथो॒ रवं॒ द्यां व॑र्षयथो॒ असु॑रस्य मा॒यया॑ ॥३॥

स॒म्ऽराजौ॑ । उ॒ग्रा । वृ॒ष॒भा । दि॒वः । पती॑ इति॑ । पृ॒थि॒व्याः । मि॒त्रावरु॑णा । विच॑र्षणी॒ इति॒ विऽच॑र्षणी । चि॒त्रेभिः॑ । अ॒भ्रैः । उप॑ । ति॒ष्ठ॒थः॒ । रव॑म् । द्याम् । व॒र्ष॒य॒थः॒ । असु॑रस्य । मा॒यया॑ ॥

Mantra without Swara
सम्राजा उग्रा वृषभा दिवस्पती पृथिव्या मित्रावरुणा विचर्षणी। चित्रेभिरभ्रैरुप तिष्ठथो रवं द्यां वर्षयथो असुरस्य मायया ॥

सम्ऽराजौ। उग्रा। वृषभा। दिवः। पती इति। पृथिव्याः। मित्रावरुणा। विचर्षणी इति विऽचर्षणी। चित्रेभिः। अभ्रैः। उप। तिष्ठथः। रवम्। द्याम्। वर्षयथः। असुरस्य। मायया ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 3

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Meaning
हे राजा और मन्त्रीजनो ! जैसे (वृषभा) बलिष्ठ वृष्टि के कारण (पृथिव्याः) भूमि के और (दिवः) प्रकाश के (पती) पालन करनेवाले (विचर्षणी) प्रकाशक (मित्रावरुणा) वायु और सूर्य्य (चित्रेभिः) अद्भुत (अभ्रैः) मेघों के साथ (उप, तिष्ठथः) समीप में स्थित होते हैं और (असुरस्य) मेघ के (मायया) आच्छादन आदि से वा बुद्धि से (रवम्) शब्द को और (द्याम्) प्रकाश को करते हैं, वैसे (उग्रा) तेजस्वी (सम्राजौ) उत्तम प्रकार शोभित होनेवाले आप दोनों प्रजाओं के समीप स्थित होते हैं, और कामनाओं से प्रजाओं को (वर्षयथः) वृष्टियुक्त करते हैं ॥३॥
Essence
हे प्रजाजनो ! जो राजा और मन्त्री आदि जन न्याय और विनय से प्रकाशमान, दुष्टों में तेजस्वी और कठोर दण्ड के देनेवाले, सूर्य्य और वायु के सदृश मनोरथों की वृष्टि करतेवाले हैं, वे यशस्वी और प्रजाओं के प्रिय होते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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