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Rigveda Mandal 5 / Sukta 63 / Mantra 2

87 Sukta
7 Mantra
5/63/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- श्रुतिविदात्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒म्राजा॑व॒स्य भुव॑नस्य राजथो॒ मित्रा॑वरुणा वि॒दथे॑ स्व॒र्दृशा॑। वृ॒ष्टिं वां॒ राधो॑ अमृत॒त्वमी॑महे॒ द्यावा॑पृथि॒वी वि च॑रन्ति त॒न्यवः॑ ॥२॥

स॒म्ऽराजौ॑ । अ॒स्य । भुव॑नस्य । रा॒ज॒थः॒ । मित्रा॑वरुणा । वि॒दथे॑ । स्वः॒ऽदृशा॑ । वृ॒ष्टिम् । वा॒म् । राधः॑ । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । ई॒म॒हे॒ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । वि । च॒र॒न्ति॒ । त॒न्यवः॑ ॥

Mantra without Swara
सम्राजावस्य भुवनस्य राजथो मित्रावरुणा विदथे स्वर्दृशा। वृष्टिं वां राधो अमृतत्वमीमहे द्यावापृथिवी वि चरन्ति तन्यवः ॥

सम्ऽराजौ। अस्य। भुवनस्य। राजथः। मित्रावरुणा। विदथे। स्वःऽदृशा। वृष्टिम्। वाम्। राधः। अमृतऽत्वम्। ईमहे। द्यावापृथिवी इति। वि। चरन्ति। तन्यवः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्रावरुणा) वायु और सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान (स्वर्दृशा) सुख को दिखाने और (सम्राजौ) उत्तम प्रकार शोभित होनेवाले राजा और मन्त्रीजनो ! आप जैसे (तन्यवः) बिजुलियाँ (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि को (वि, चरन्ति) विचरती और (वृष्टिम्) वृष्टि को उत्पन्न करती हैं, वैसे (अस्य) इस (भुवनस्य) संसार के मध्य (विदथे) सङ्ग्राम में (राजथः) प्रकाशित होते हैं, हम लोग (वाम्) आप दोनों से (रायः) धन और (अमृतत्वम्) जल होने की (ईमहे) याचना करते हैं ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु और बिजुली वर्षा करके सब मनुष्यों को धन और धान्य से युक्त करते हैं, वैसे धार्मिक राजा और मन्त्री प्रजाओं को ऐश्वर्य्ययुक्त करें ॥२॥
Subject
फिर मित्रावरुणवाच्य राजा अमात्य विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥