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Rigveda Mandal 5 / Sukta 63 / Mantra 1

87 Sukta
7 Mantra
5/63/1
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- श्रुतिविदात्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋत॑स्य गोपा॒वधि॑ तिष्ठथो॒ रथं॒ सत्य॑धर्माणा पर॒मे व्यो॑मनि। यमत्र॑ मित्रावरु॒णाव॑थो यु॒वं तस्मै॑ वृ॒ष्टिर्मधु॑मत्पिन्वते दि॒वः ॥१॥

ऋत॑स्य । गो॒पौ॒ । अधि॑ । ति॒ष्ठ॒थः॒ । रथ॑म् । सत्य॑ऽधर्माणा । प॒र॒मे । विऽओ॑मनि । यम् । अत्र॑ । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । अव॑थः । यु॒वम् । तस्मै॑ । वृ॒ष्टिः । मधु॑ऽमत् । पि॒न्व॒ते॒ । दि॒वः ॥

Mantra without Swara
ऋतस्य गोपावधि तिष्ठथो रथं सत्यधर्माणा परमे व्योमनि। यमत्र मित्रावरुणावथो युवं तस्मै वृष्टिर्मधुमत्पिन्वते दिवः ॥

ऋतस्य। गोपौ। अधि। तिष्ठथः। रथम्। सत्यऽधर्माणा। परमे। विऽओमानि। यम्। अत्र। मित्रावरुणा। अवथः। युवम्। तस्मै। वृष्टिः। मधुऽमत्। पिन्वते। दिवः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋतस्य) ऋत अर्थात् सत्य की (गोपौ) रक्षा करनेवाले और (सत्यधर्माणा) सत्य है धर्म जिनका ऐसे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश वर्त्तमान राजा और अमात्य जनो ! (युवम्) आप दोनों (परमे) अति उत्तम (व्योमनि) आकाश के सदृश प्रकाशित व्यापक परमात्मा में स्थित होकर (रथम्) वाहन पर (अधि, तिष्ठथः) वर्त्तमान हूजिये और (अत्र) इस राज्य में (यम्) जिसकी (अवथः) रक्षा करते हैं (तस्मै) उसके लिये (दिवः) अन्तरिक्ष से (वृष्टिः) वर्षा (मधुमत्) मधुर आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त (पिन्वते) सिञ्चन करती है ॥१॥
Essence
जहाँ धार्मिक विद्वान् पुत्र की जैसे वैसे प्रजा की पालना करनेवाला राजा आदि होते हैं, वहाँ उचित काल में वृष्टि और उचित काल में मृत्यु होता है ॥१॥
Subject
अब चतुर्थाध्याय का आरम्भ है और पञ्चम मण्डल में सात ऋचावाले त्रेसठवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मित्रावरुण विद्वद्विषय को कहते हैं ॥