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Rigveda Mandal 5 / Sukta 62 / Mantra 9

87 Sukta
9 Mantra
5/62/9
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- श्रुतिविदात्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यद्बंहि॑ष्ठं॒ नाति॒विधे॑ सुदानू॒ अच्छि॑द्रं॒ शर्म॑ भुवनस्य गोपा। तेन॑ नो मित्रावरुणावविष्टं॒ सिषा॑सन्तो जिगी॒वांसः॑ स्याम ॥९॥

यत् । बंहि॑ष्ठम् । न । अ॒ति॒ऽविधे॑ । सु॒दा॒नू॒ इति॑ सुऽदानू । अच्छि॑द्रम् । शर्म॑ । भु॒व॒न॒स्य॒ । गो॒पा॒ । तेन॑ । नः॒ । मि॒त्रा॒व॒रु॒णौ॒ । अ॒वि॒ष्ट॒म् । सिसा॑सन्तः । जि॒गी॒वांसः॑ । स्या॒म॒ ॥

Mantra without Swara
यद्बंहिष्ठं नातिविधे सुदानू अच्छिद्रं शर्म भुवनस्य गोपा। तेन नो मित्रावरुणावविष्टं सिषासन्तो जिगीवांसः स्याम ॥

यत्। बंहिष्ठम्। न। अतिऽविधे। सुदानू इति सुऽदानू। अच्छिद्रम्। शर्म। भुवनस्य। गोपा। तेन। नः। मित्रावरुणौ। अविष्टम्। सिसासन्तः। जिगीवांसः। स्याम ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 31 Mantra » 4

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Meaning
हे (सुदानू) उत्तम दान करनेवाले (भुवनस्य) सम्पूर्ण संसार के (गोपा) रक्षक (मित्रावरुणौ) प्राण और उदान के सदृश वर्त्तमान राजा और मन्त्रीजनो ! आप दोनों जैसे (न, अतिविधे) अतिवेधन करने के अयोग्य (यत्) जिस (बंहिष्ठम्) अत्यन्त वृद्ध (अच्छिद्रम्) छिद्ररहित (शर्म) गृह को प्राप्त हूजिये (तेन) इससे (नः) हम लोगों को (अविष्टम्) व्याप्त हूजिये जिससे हम लोग (सिषासन्तः) विभाग करते हुए (जिगीवांसः) शत्रुओं के धनों को जीतने की इच्छा करनेवाले (स्याम) होवें ॥९॥
Essence
विद्वान् जन अति उत्तम गृहों को रचकर और वहाँ विचार करके विजय, विद्या और क्रिया को प्राप्त होते हैं ॥९॥ इस सूक्त में सूर्य, प्राण, उदान और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्विरजानन्दसरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमद्दयानदसरस्वतीस्वामिविरचित उत्तम प्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्य में चतुर्थाष्टक में तीसरा अध्याय इकतीसवाँ वर्ग और पञ्चम मण्डल में बासठवाँ सूक्त समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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