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Rigveda Mandal 5 / Sukta 62 / Mantra 8

87 Sukta
9 Mantra
5/62/8
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- श्रुतिविदात्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यरूपमु॒षसो॒ व्यु॑ष्टा॒वयः॑स्थूण॒मुदि॑ता॒ सूर्य॑स्य। आ रो॑हथो वरुण मित्र॒ गर्त॒मत॑श्चक्षाथे॒ अदि॑तिं॒ दितिं॑ च ॥८॥

हिर॑ण्यऽरूपम् । उ॒षसः॑ । विऽउ॑ष्टौ । अयः॑ऽस्थूणम् । उत्ऽइ॑ता । सूर्य॑स्य । आ । रो॒ह॒थः॒ । व॒रु॒ण॒ । मि॒त्र॒ । गर्त॑म् । अतः॑ । च॒क्षा॒थे॒ इति॑ । अदि॑तिम् । दिति॑म् । च॒ ॥

Mantra without Swara
हिरण्यरूपमुषसो व्युष्टावयःस्थूणमुदिता सूर्यस्य। आ रोहथो वरुण मित्र गर्तमतश्चक्षाथे अदितिं दितिं च ॥

हिरण्यऽरूपम्। उषसः। विऽउष्टौ। अयःऽस्थूणम्। उत्ऽइता। सूर्यस्य। आ। रोहथः। वरुण। मित्र। गर्तम्। अतः। चक्षाथे इति। अदितिम्। दितिम्। च ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 31 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्र) (वरुण) प्राण और उदान वायु के सदृश वर्त्तमान राजा और मन्त्रीजनो ! आप दोनों जैसे (सूर्य्यस्य) सूर्य्य के (उदिता) उदय में और (उषसः) प्रातःकाल के (व्युष्टौ) विशेष दाह वा निवास में (अयःस्थूणम्) सुवर्ण के खम्भे के सदृश (हिरण्यरूपम्) तेजःस्वरूप को (आ, रोहथः) आरोहण करते हैं, (अतः) इस कारण से (गर्त्तम्) गृह को अधिष्ठित हो के (अदितिम्) नहीं नष्ट होनेवाले कारण (दितिम्, च) और नाश होनेवाले कार्य्य का (चक्षाथे) उपदेश करते हैं, उन दोनों को हम लोग मिलें ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य के उदय होने पर अन्धकार निवृत्त होता और प्रकाश होता है, वैसे ही कार्य्य और कारणरूप विद्या के जाननेवाले राजा और मन्त्रीजन मित्र के सदृश वर्त्ताव करके दृढ़ न्याय का प्रचार करावें ॥८॥
Subject
फिर मित्रावरुण के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥