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Rigveda Mandal 5 / Sukta 62 / Mantra 7

87 Sukta
9 Mantra
5/62/7
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- श्रुतिविदात्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यनिर्णि॒गयो॑ अस्य॒ स्थूणा॒ वि भ्रा॑जते दि॒व्य१॒॑श्वाज॑नीव। भ॒द्रे क्षेत्रे॒ निमि॑ता॒ तिल्वि॑ले वा स॒नेम॒ मध्वो॒ अधि॑गर्त्यस्य ॥७॥

हिर॑ण्यऽनिर्निक् । अयः॑ । अ॒स्य॒ । स्थूणा॑ । वि । भ्रा॒ज॒ते॒ । दि॒वि । अ॒श्वाज॑नीऽइव । भ॒द्रे । क्षेत्रे॑ । निऽमि॑ता । तल्वि॑ले । वा॒ । स॒नेम॑ । मध्वः॑ । अधि॑ऽगर्त्यस्य ॥

Mantra without Swara
हिरण्यनिर्णिगयो अस्य स्थूणा वि भ्राजते दिव्य१श्वाजनीव। भद्रे क्षेत्रे निमिता तिल्विले वा सनेम मध्वो अधिगर्त्यस्य ॥

हिरण्यऽनिर्निक्। अयः। अस्य। स्थूणा। वि। भ्राजते। दिवि। अश्वाजनीऽइव। भद्रे। क्षेत्रे। निऽमिता। तिल्विले। वा। सनेम। मध्वः। अधिऽगर्त्यस्य ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 31 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
इस संसार में जो (हिरण्यनिर्णिक्) पृथिवी के सुवर्ण और अग्नि के तेज को अत्यन्त निश्चय करने और (अयः) जानेवाला (अस्य) इस राज्य और जगत् के मध्य में (दिवि) प्रकाश में (भद्रे) कल्याणकारक (तिल्विले) स्नेह के स्थान में (क्षेत्रे) निवास करते हैं जिस पुण्य कर्म्म में उसमें (वि, भ्राजते) विशेष प्रकाशित होता है और (अश्वाजनीव) बिजुली के सदृश (निमिता) अत्यन्त मापी अर्थात् जाँची गई (वा) अथवा (स्थूणा) खम्भे के सदृश दृढनीति विशेष प्रकाशित होती है उस और उसको (अधिगर्त्यस्य) अधिक सुन्दर गृह में हुए (मध्वः) मधुरादि पदार्थ के मध्य में हम लोग (सनेम) विभाग करें ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य श्रेष्ठ व्यवहार में विराजमान बिजुली आदि की विद्या को ग्रहण करते हुए गृह के कृत्य में यथावत् न्याय को करते हैं, विभाग कर और विभाग देकर कृत्यकृत्य होते हैं, वे नीतिवाले होते हैं ॥७॥
Subject
फिर प्रसङ्ग से विद्युद्विद्या विषय को कहते हैं ॥