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Rigveda Mandal 5 / Sukta 62 / Mantra 4

87 Sukta
9 Mantra
5/62/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- श्रुतिविदात्रेयः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वा॒मश्वा॑सः सु॒युजो॑ वहन्तु य॒तर॑श्मय॒ उप॑ यन्त्व॒र्वाक्। घृ॒तस्य॑ नि॒र्णिगनु॑ वर्तते वा॒मुप॒ सिन्ध॑वः प्र॒दिवि॑ क्षरन्ति ॥४॥

आ । वा॒म् । अश्वा॑सः । सु॒ऽयुजः॑ । व॒ह॒न्तु॒ । य॒तऽर॑श्मयः । उप॑ । य॒न्तु॒ । अ॒र्वाक् । घृ॒तस्य॑ । निः॒ऽनिक् । अनु॑ । व॒र्त॒ते॒ । वा॒म् । उप॑ । सिन्ध॑वः । प्र॒ऽदिवि॑ । क्ष॒र॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
आ वामश्वासः सुयुजो वहन्तु यतरश्मय उप यन्त्वर्वाक्। घृतस्य निर्णिगनु वर्तते वामुप सिन्धवः प्रदिवि क्षरन्ति ॥

आ। वाम्। अश्वासः। सुऽयुजः। वहन्तु। यतऽरश्मयः। उप। यन्तु। अर्वाक्। घृतस्य। निःऽनिक्। अनु। वर्तते। वाम्। उप। सिन्धवः। प्रऽदिवि। क्षरन्ति ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे वाहन के बनाने और चलानेवाले जनो ! जो जैसे (वाम्) आप दोनों के (सुयुजः) उत्तम प्रकार मिलनेवाले (यतरश्मयः) ग्रहण की गई किरणें वा रस्सियाँ जिनकी ऐसे (अश्वासः) अग्नि आदि पदार्थ वा घोड़े (घृतस्य) जल के (अर्वाक्) नीचे से (आ, वहन्तु) पहुँचावें और यानों को (उप, यन्तु) चलावें और (निर्णिक्) निर्णय करनेवाला सारथी (अनु, वर्त्तते) प्रवृत्त होता है और (प्रदिवि) प्रकाशस्वरूप अग्नि में (सिन्धवः) नदियाँ (वाम्) आप दोनों को (उप, क्षरन्ति) जल किंछती हैं, वैसा प्रयत्न कीजिये ॥४॥
Essence
जो मनुष्य वाहनों में यन्त्रकलाओं को रच के नीचे अग्नि और ऊपर जल स्थापित करके और फिर उस अग्नि को प्रदीप्त करके मार्गों में चलावें तो बहुत लक्ष्मियाँ इनको प्राप्त हों ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥