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Rigveda Mandal 5 / Sukta 62 / Mantra 3

87 Sukta
9 Mantra
5/62/3
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- श्रुतिविदात्रेयः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अधा॑रयतं पृथि॒वीमु॒त द्यां मित्र॑राजाना वरुणा॒ महो॑भिः। व॒र्धय॑त॒मोष॑धीः॒ पिन्व॑तं॒ गा अव॑ वृ॒ष्टिं सृ॑जतं जीरदानू ॥३॥

अधा॑रयतम् । पृ॒थि॒वीम् । उ॒त । द्याम् । मित्र॑ऽराजाना । व॒रु॒णा॒ । महः॑ऽभिः । व॒र्धय॑तम् । ओष॑धीः । पिन्व॑तम् । गाः । अव॑ । वृ॒ष्टि॑म् । सृ॒ज॒त॒म् । जी॒र॒दा॒नू॒ इति॑ जीरऽदानू ॥

Mantra without Swara
अधारयतं पृथिवीमुत द्यां मित्रराजाना वरुणा महोभिः। वर्धयतमोषधीः पिन्वतं गा अव वृष्टिं सृजतं जीरदानू ॥

अधारयतम्। पृथिवीम्। उत। द्याम्। मित्रऽराजाना। वरुणा। महःऽभिः। वर्धयतम्। ओषधीः। पिन्वतम्। गाः। अव। वृष्टिम्। सृजतम्। जीरदानू इति जीरऽदानू ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जीरदानू) जीवन के देनेवाले (वरुणा) श्रेष्ठ ! (मित्रराजाना) जैसे वायु और बिजुली (पृथिवीम्) भूमि को (उत) और (द्याम्) सूर्य्य को धारण करते हैं, वैसे (अधारयतम्) धारण कीजिये और जैसे ये दोनों (महोभिः) बड़े गुणों से (ओषधीः) यव आदि ओषधियों को बढ़ाते हैं, वैसे आप दोनों (वर्धयतम्) बढ़ावें, (गाः) पृथिवियों को तृप्त करते हैं, वैसे आप दोनों (पिन्वतम्) तृप्त कीजिये और जैसे ये दोनों (वृष्टिम्) वृष्टि को उत्पन्न करते हैं, वैसे (अव, सृजतम्) उत्पन्न कीजिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा और मन्त्रीजनो ! आप दोनों प्राण और सूर्य्य के सदृश वर्त्ताव कर पृथिवी के राज्य का पालन कर वैद्य और ओषधियों की वृद्धि कर और वृष्टि की उन्नति करके सबके सुख के लिये वर्त्ताव कीजिये ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥