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Rigveda Mandal 5 / Sukta 62 / Mantra 2

87 Sukta
9 Mantra
5/62/2
Devata- रथवीतिर्दाल्भ्यः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तत्सु वां॑ मित्रावरुणा महि॒त्वमी॒र्मा त॒स्थुषी॒रह॑भिर्दुदुह्रे। विश्वाः॑ पिन्वथः॒ स्वस॑रस्य॒ धेना॒ अनु॑ वा॒मेकः॑ प॒विरा व॑वर्त ॥२॥

तत् । सु । वा॒म् । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । म॒हि॒ऽत्वम् । ई॒र्मा । त॒स्थुषीः॑ । अह॑ऽभिः । दु॒दु॒ह्रे॒ । विश्वाः॑ । पि॒न्व॒थः॒ । स्वस॑रस्य । धेनाः॑ । अनु॑ । वा॒म् । एकः॑ । प॒विः । आ । व॒व॒र्त॒ ॥

Mantra without Swara
तत्सु वां मित्रावरुणा महित्वमीर्मा तस्थुषीरहभिर्दुदुह्रे। विश्वाः पिन्वथः स्वसरस्य धेना अनु वामेकः पविरा ववर्त ॥

तत्। सु। वाम्। मित्रावरुणा। महिऽत्वम्। ईर्मा। तस्थुषीः। अहऽभिः। दुदुह्रे। विश्वाः। पिन्वथः। स्वसरस्य। धेनाः। अनु। वाम्। एकः। पविः। आ। ववर्त ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 2

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Meaning
हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश अध्यापक और उपदेशक जनो ! (वाम्) आप दोनों के जिस (महित्वम्) महत्त्व की (ईर्मा) निरन्तर चलनेवाला रक्षा करता है (तत्) उसकी आप दोनों (पिन्वथः) तृप्ति कीजिये और जैसे (अहभिः) दिनों से किरणें (तस्थुषीः) स्थिर वेलाओं को (सु) उत्तम प्रकार (दुदुह्रे) पूर्ण करते हैं और (स्वसरस्य) दिन के मध्य में (वाम्) आप दोनों (विश्वाः) सम्पूर्ण (धेनाः) वाणियों को तृप्त कीजिये वैसे (एकः) सहायरहित केवल एक (पविः) पवित्र व्यवहार (अनु) अनुकूल (आ) (ववर्त) वर्तमान हो ॥२॥
Essence
हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! आप दोनों मनुष्यों को रात्रि-दिन, प्राण, उदान और बिजुली की विद्याओं को ग्रहण कराइये, जिससे सम्पूर्ण प्रजायें आनन्दित होवें ॥२॥
Subject
अब मित्रावरुण के गुणों को कहते हैं ॥

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