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Rigveda Mandal 5 / Sukta 61 / Mantra 8

87 Sukta
19 Mantra
5/61/8
Devata- शशीयशी Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒त घा॒ नेमो॒ अस्तु॑तः॒ पुमाँ॒ इति॑ ब्रुवे प॒णिः। स वैर॑देय॒ इत्स॒मः ॥८॥

उ॒त । घ॒ । नेमः॑ । अस्तु॑तः । पुमा॑न् । इति॑ । ब्रु॒वे॒ । प॒णिः । सः । वैर॑ऽदेये । इत् । स॒मः ॥

Mantra without Swara
उत घा नेमो अस्तुतः पुमाँ इति ब्रुवे पणिः। स वैरदेय इत्समः ॥

उत। घ। नेमः। अस्तुतः। पुमान्। इति। ब्रुवे। पणिः। सः। वैरऽदेये। इत्। समः ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 27 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अस्तुतः) नहीं प्रशंसा किया गया (उत) और (नेमः) आधे का अधिकारी (घा) ही (वैरदेये) वैर देने योग्य जिससे उसमें (पुमान्) पुरुष और जो (पणिः) प्रशंसित वर्त्तमान है (सः, इत्) वही (समः) तुल्य है (इति) इस प्रकार से मैं (ब्रुवे) कहता हूँ ॥८॥
Essence
जो आलस्ययुक्त जन श्रेष्ठ कर्म्मों में नहीं प्रवृत्त होता है और दूसरा विद्वान् पुरुष सत्य और असत्य को जानकर सत्य का आचरण नहीं करता है, वे दोनों तुल्य अधर्मात्मा हैं, यह जानना चाहिये ॥८॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥