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Rigveda Mandal 5 / Sukta 61 / Mantra 4

87 Sukta
19 Mantra
5/61/4
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
परा॑ वीरास एतन॒ मर्या॑सो॒ भद्र॑जानयः। अ॒ग्नि॒तपो॒ यथास॑थ ॥४॥

परा॑ । वी॒रा॒सः॒ । इ॒त॒न॒ । मर्या॑सः । भद्र॑ऽजानयः । अ॒ग्नि॒ऽतपः॑ । यथा॑ । अस॑थ ॥

Mantra without Swara
परा वीरास एतन मर्यासो भद्रजानयः। अग्नितपो यथासथ ॥

परा। वीरासः। इतन। मर्यासः। भद्रऽजानयः। अग्निऽतपः। यथा। असथ ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 26 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोग (यथा) जैसे (अग्नितपः) अग्नि से तपानेवाले (वीरासः) विद्या और बल से व्याप्त (मर्यासः) मनुष्य (परा) दूर के लिये (एतन) प्राप्त हों और (भद्रजानयः) कल्याण के जाननेवाले (असथ) होवें, वैसे वे सत्कार करने योग्य होवें ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो बन्धन के साधन और पाप के आचरण का त्याग कर और त्याग करा के और मुक्ति के साधन को ग्रहण कर और ग्रहण करा के सब को आनन्दित करते हैं, उनको सब आनन्दित करें ॥४॥
Subject
अब विद्वानों के उपदेश विषय को कहते हैं ॥