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Rigveda Mandal 5 / Sukta 61 / Mantra 3

87 Sukta
19 Mantra
5/61/3
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ज॒घने॒ चोद॑ एषां॒ वि स॒क्थानि॒ नरो॑ यमुः। पु॒त्र॒कृ॒थे न जन॑यः ॥३॥

ज॒घने॑ । चोदः॑ । ए॒षा॒म् । वि । स॒क्थानि॑ । नरः॑ । य॒मुः॒ । पु॒त्र॒ऽकृ॒थे । न । जन॑यः ॥

Mantra without Swara
जघने चोद एषां वि सक्थानि नरो यमुः। पुत्रकृथे न जनयः ॥

जघने। चोदः। एषाम्। वि। सक्थानि। नरः। यमुः। पुत्रऽकृथे। न। जनयः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 26 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) नायक जनो ! (पुत्रकृथे) पुत्र करने में (जनयः) माता-पिता (न) जैसे वैसे (एषाम्) इनके (जघने) कटि के नीचे के भाग के अवयवों को जो (चोदः) प्रेरणा करनेवाला है और जो (सक्थानि) घुटनों को (वि, यमुः) नियम में रक्खें, उनका आप लोग सत्कार करो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे उत्पन्न करनेवाले माता-पिता सुन्दर नियम से सन्तानोत्पत्ति करके इनको उत्तम प्रकार नियमयुक्त करके उत्तम प्रकार शिक्षित करें, वैसे सब करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥