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Rigveda Mandal 5 / Sukta 61 / Mantra 17

87 Sukta
19 Mantra
5/61/17
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए॒तं मे॒ स्तोम॑मूर्म्ये दा॒र्भ्याय॒ परा॑ वह। गिरो॑ देवि र॒थीरि॑व ॥१७॥

ए॒तम् । मे॒ । स्तोम॑म् । ऊ॒र्म्ये । दा॒र्भ्याय॑ । परा॑ । व॒ह॒ । गिरः॑ । दे॒वि॒ । र॒थीःऽइ॑व ॥

Mantra without Swara
एतं मे स्तोममूर्म्ये दार्भ्याय परा वह। गिरो देवि रथीरिव ॥

एतम्। मे। स्तोमम्। ऊर्म्ये। दार्भ्याय। परा। वह। गिरः। देवि। रथीःऽइव ॥१७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 29 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देवि) प्रकाशमान विद्यायुक्त स्त्री ! (ऊर्म्ये) रात्रि के सदृश वर्त्तमान आप (मे) मेरी (एतम्) इस (स्तोमम्) प्रशंसा को सुनिये और (दार्भ्याय) विदारण करनेवालों में हुए के लिये वर्त्तमान को (परा, वह) दूर कीजिये तथा (रथीरिव) प्रशंसित रथवाला जैसे वैसे (गिरः) वाणियों को धारण कीजिये ॥१७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे प्राणियों के सुख के लिये रात्रि है, वैसे ही पति आदिकों के सुख के लिये श्रेष्ठ स्त्री होती है ॥१७॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥