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Rigveda Mandal 5 / Sukta 61 / Mantra 12

87 Sukta
19 Mantra
5/61/12
Devata- तरन्तो वैददश्विः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
येषां॑ श्रि॒याधि॒ रोद॑सी वि॒भ्राज॑न्ते॒ रथे॒ष्वा। दि॒वि रु॒क्मइ॑वो॒परि॑ ॥१२॥

येषा॑म् । श्रि॒या । अधि॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । वि॒ऽभ्राज॑न्ते । रथे॑षु । आ । दि॒वि । रु॒क्मःऽइ॑व । उ॒परि॑ ॥

Mantra without Swara
येषां श्रियाधि रोदसी विभ्राजन्ते रथेष्वा। दिवि रुक्मइवोपरि ॥

येषाम्। श्रिया। अधि। रोदसी इति। विऽभ्राजन्ते। रथेषु। आ। दिवि। रुक्मःऽइव। उपरि ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 28 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (येषाम्) जिन विद्वानों की (श्रिया) शोभा वा लक्ष्मी से, धर्मयुक्त व्यवहार (दिवि) कामना में (रुक्मइव) प्रीतिकारक सुवर्ण आदि पदार्थ जैसे वैसे (विभ्राजन्ते) शोभित होते हैं और जो (रथेषु) विमान आदि वाहनों में (आ, अधि) विराजित होवें वे (उपरि) ऊपर (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी के सदृश प्रकाशित होते हैं ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो धर्मयुक्त पुरुषार्थ से धन आदि को इकट्ठे करते हैं, वे सूर्य्य के किरणों के सदृश प्रकाशित यशवाले होते हैं ॥१२॥
Subject
फिर उपदेश विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥