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Rigveda Mandal 5 / Sukta 61 / Mantra 11

87 Sukta
19 Mantra
5/61/11
Devata- पुरुमीळ्हो वैददश्विः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
य ईं॒ वह॑न्त आ॒शुभिः॒ पिब॑न्तो मदि॒रं मधु॑। अत्र॒ श्रवां॑सि दधिरे ॥११॥

ये । ई॒म् । वह॑न्ते । आ॒शुऽभिः॑ । पिब॑न्तः । म॒दि॒रम् । मधु॑ । अत्र॑ । श्रवां॑सि । द॒धि॒रे॒ ॥

Mantra without Swara
य ईं वहन्त आशुभिः पिबन्तो मदिरं मधु। अत्र श्रवांसि दधिरे ॥

ये। ईम्। वहन्ते। आशुऽभिः। पिबन्तः। मदिरम्। मधु। अत्र। श्रवांसि। दधिरे ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 28 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (ये) जो (आशुभिः) शीघ्रकारी गुणों से (मदिरम्) आनन्दकारक (ईम्) जल को (वहन्ते) प्राप्त होते हैं और (मधु) माधुर्य्य आदि गुणों से युक्त को (पिबन्तः) पीते हुए (अत्र) यहाँ (श्रवांसि) अन्न आदिकों को (दधिरे) धारण करते हैं, वे ही लक्ष्मीवान् होते हैं ॥११॥
Essence
जो शीघ्र सुखकारक और बुद्धिवर्धक वस्तुओं का सेवन करते हैं, वे यहाँ लक्ष्मीवान् होते हैं ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥