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Rigveda Mandal 5 / Sukta 61 / Mantra 10

87 Sukta
19 Mantra
5/61/10
Devata- शशीयशी Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो मे॑ धेनू॒नां श॒तं वैद॑दश्वि॒र्यथा॒ दद॑त्। त॒र॒न्तइ॑व मं॒हना॑ ॥१०॥

यः । मे॒ । धे॒नू॒नाम् । श॒तम् । वैद॑त्ऽअश्विः । यथा॑ । दद॑त् । त॒र॒न्तःऽइ॑व । मं॒हना॑ ॥

Mantra without Swara
यो मे धेनूनां शतं वैददश्विर्यथा ददत्। तरन्तइव मंहना ॥

यः। मे। धेनूनाम्। शतम्। वैदत्ऽअश्विः। यथा। ददत्। तरन्तःऽइव। मंहना ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 27 Mantra » 5

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Meaning
(यः) जो (वैददश्विः) घोड़ों के ज्ञाता का पुत्र (मे) मेरी (धेनूनाम्) गौओं के (शतम्) सैकड़े को (ददत्) देता है (यथा) जैसे (मंहना) बड़ी नौका से (तरन्तइव) तैरते हुओं के समान दुःख के पार पहुँचाता है, वही स्वामी होने के योग्य होता है ॥१०॥
Essence
जो मनुष्य सैकड़ों वा हजारों का देनेवाला होता है और दुग्ध देनेवाली गौओं की रक्षा करता है, वह नौका से नदी वा समुद्र को तरता है, वैसे ही बुद्धिमान् स्त्री और पुरुष दुःखरूपी सागर को धर्म के आचरण से तरते हैं ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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