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Rigveda Mandal 5 / Sukta 60 / Mantra 8

87 Sukta
8 Mantra
5/60/8
Devata- मरुतो वाग्निश्च Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्ने॑ म॒रुद्भिः॑ शु॒भय॑द्भि॒र्ऋक्व॑भिः॒ सोमं॑ पिब मन्दसा॒नो ग॑ण॒श्रिभिः॑। पा॒व॒केभि॑र्विश्वमि॒न्वेभि॑रा॒युभि॒र्वैश्वा॑नर प्र॒दिवा॑ के॒तुना॑ स॒जूः ॥८॥

अग्ने॑ । म॒रुत्ऽभिः॑ । शु॒भय॑त्ऽभिः । ऋक्व॑ऽभिः । सोम॑म् । पि॒ब॒ । म॒न्द॒सा॒नः । ग॒ण॒श्रिऽभिः॑ । पा॒व॒केभिः॑ । वि॒श्व॒म्ऽइ॒न्वेभिः॑ । आ॒युऽभिः॑ । वैश्वा॑नर । प्र॒ऽदिवा॑ । के॒तुना॑ । स॒ऽजूः ॥

Mantra without Swara
अग्ने मरुद्भिः शुभयद्भिर्ऋक्वभिः सोमं पिब मन्दसानो गणश्रिभिः। पावकेभिर्विश्वमिन्वेभिरायुभिर्वैश्वानर प्रदिवा केतुना सजूः ॥

अग्ने। मरुत्ऽभिः। शुभयत्ऽभिः। ऋक्वऽभिः। सोमम्। पिब। मन्दसानः। गणश्रिऽभिः। पावकेभिः। विश्वम्ऽइन्वेभिः। आयुऽभिः। वैश्वानर। प्रऽदिवा। केतुना। सऽजूः ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 8

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (गणश्रिभिः) समुदाय की लक्ष्मियों से (मन्दसानः) आनन्द करता हुआ (प्रदिवा) अत्यन्त प्रकाशवाली (केतुना) बुद्धि के साथ (सजूः) तुल्य प्रीति को सेवनेवाले (वैश्वानर) सब में मुख्य आप (शुभयद्भिः) उत्तम आचरण करनेवाले (ऋक्वभिः) सत्कार करने योग्य (पावकेभिः) पवित्र (विश्वमिन्वेभिः) सम्पूर्ण संसार के व्यवहार को प्राप्त कराते हुए (आयुभिः) जीवनों में (मरुद्भिः) मनुष्यों के साथ (सोमम्) बड़ी औषधियों के रस का (पिब) पान करिये ॥८॥
Essence
मनुष्यों की योग्यता है कि सदा यथार्थवक्ता विद्वानों के साथ मिलकर विद्या, अवस्था और बुद्धि को बढ़ाकर औषध के सदृश आहार और विहार को करके उत्तम आचरण सर्वदा करें ॥८॥ इस सूक्त में वायु, अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह साठवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब विद्वानों की सेवा करना अगले मन्त्र में कहते हैं ॥