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Rigveda Mandal 5 / Sukta 60 / Mantra 5

87 Sukta
8 Mantra
5/60/5
Devata- मरुतो वाग्निश्च Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ज्ये॒ष्ठासो॒ अक॑निष्ठास ए॒ते सं भ्रात॑रो वावृधुः॒ सौभ॑गाय। युवा॑ पि॒ता स्वपा॑ रु॒द्र ए॑षां सु॒दुघा॒ पृश्निः॑ सु॒दिना॑ म॒रुद्भ्यः॑ ॥५॥

अ॒ज्ये॒ष्ठासः॑ । अक॑निष्ठासः । ए॒ते । सम् । भ्रात॑रः । व॒वृ॒धुः॒ । सौभ॑गाय । युवा॑ । पि॒ता । स्वपा॑ । रु॒द्रः । ए॒षा॒म् । सु॒ऽदुघा॑ । पृश्निः॑ । सु॒ऽदिना॑ । म॒रुत्ऽभ्यः॑ ॥

Mantra without Swara
अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय। युवा पिता स्वपा रुद्र एषां सुदुघा पृश्निः सुदिना मरुद्भ्यः ॥

अज्येष्ठासः। अकनिष्ठासः। एते। सम्। भ्रातरः। ववृधुः। सौभगाय। युवा। पिता। सुऽअपाः। रुद्रः। एषाम्। सुऽदुघा। पृश्निः। सुऽदिना। मरुत्ऽभ्यः ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (स्वपाः) श्रेष्ठ कर्म का अनुष्ठान करनेवाला (युवा) युवावस्थायुक्त और (रुद्रः) अन्यों को रुलानेवाला (पिता) पालक जन और (एषाम्) इन की (सुदुघा) उत्तम प्रकार मनोरथ को पूर्ण करनेवाली (सुदिना) सुन्दर दिन जिससे वह (पृश्निः) अन्तरिक्ष के सदृश बुद्धि (मरुद्भ्यः) मनुष्यों के लिये विद्यादि दान देती है, वैसे (अज्येष्ठासः) जेठेपन से रहित (अकनिष्ठासः) कनिष्ठपन से रहित (एते) ये (भ्रातरः) बन्धु जन (सौभगाय) श्रेष्ठ ऐश्वर्य्य होने के लिये (सम्, वावृधुः) बढ़ते हैं ॥५॥
Essence
जो मनुष्य पूर्ण युवावस्था में विद्याओं को समाप्त कर और सुशीलता को स्वीकार कर बहुत ही उत्तम हुए उत्तम स्वभावयुक्त स्त्रियों को विवाह द्वारा स्वीकार करके प्रयत्न करते हैं, वे ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं ॥५॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसे होना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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