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Rigveda Mandal 5 / Sukta 60 / Mantra 2

87 Sukta
8 Mantra
5/60/2
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ ये त॒स्थुः पृष॑तीषु श्रु॒तासु॑ सु॒खेषु॑ रु॒द्रा म॒रुतो॒ रथे॑षु। वना॑ चिदुग्रा जिहते॒ नि वो॑ भि॒या पृ॑थि॒वी चि॑द्रेजते॒ पर्व॑तश्चित् ॥२॥

आ । ये । त॒स्थुः । पृष॑तीषु । श्रु॒तासु॑ । सु॒ऽखेषु॑ । रु॒द्राः । म॒रुतः॑ । रथे॑षु । वना॑ । चि॒त् । उ॒ग्राः॒ । जि॒ह॒ते॒ । नि । वः॑ । भि॒या । पृ॒थि॒वी । चि॒त् । रे॒ज॒ते॒ । पर्व॑तः । चि॒त् ॥

Mantra without Swara
आ ये तस्थुः पृषतीषु श्रुतासु सुखेषु रुद्रा मरुतो रथेषु। वना चिदुग्रा जिहते नि वो भिया पृथिवी चिद्रेजते पर्वतश्चित् ॥

आ। ये। तस्थुः। पृषतीषु। श्रुतासु। सुऽखेषु। रुद्राः। मरुतः। रथेषु। वना। चित्। उग्राः। जिहते। नि। वः। भिया। पृथिवी। चित्। रेजते। पर्वतः। चित् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो (रुद्राः) प्राण आदि और (मरुतः) मनुष्य (श्रुतासु) विद्याओं में (पृषतीषु) सेचन करनेवालियों में (सुखेषु) सुखों में और (रथेषु) विमानादि वाहनों में (आ, तस्थुः) स्थित होवें (चित्) और (वना) किरण (उग्राः) तीव्र स्वभाववालों के सदृश (नि, जिहते) निरन्तर जाते हैं और (वः) आप लोगों के (भिया) भय से (पृथिवी) भूमि (चित्) भी (रेजते) कम्पित होती है (पर्वतः) मेघ के (चित्) समान पदार्थ कम्पित होता है, उनका हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! उत्तम विद्याओं और उत्तम वाहनों पर स्थित होकर शीघ्र जाने के लिये समर्थ हूजिये ॥२॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥